Thursday, July 26, 2012

लंगड़ जवाहिरलाल

[caption id="attachment_5909" align="alignright" width="300"] लंगड़ जवाहिरलाल[/caption]

कई दिन से घूमने नहीं जा पाया था। आज सयास पत्नीजी के साथ गंगा किनारे गया। आज श्रावण शुक्लपक्ष अष्टमी है। शिवकुटी के कोटेश्वर महादेव मन्दिर पर मेला लगता है। उसकी तैयारी देखने का भी मन था।

शिवकुटी घाट की सीढियों पर जवाहिरलाल अपने नियत स्थान पर था। साथ में बांस की एक खपच्ची लिये था। बांया पैर सूजा हुआ था।

क्या हुआ? पूछने पर उसने बताया - स्कूटर वाला टक्कर मार देहे रहा। हड्डी नाहीं टूटी बा। गरम तेल से सेंकत  हई। (स्कूटर वाले ने टक्कर मार दी थी। हड्डी नहीं टूटी है। गरम तेल से सिंकाई करता हूं।)

जवाहिर लाल जितना कष्ट में था, उतना ही दयनीय भी दिख रहा था। सामान्यत: वह अपने हालात में प्रसन्नमन दिखता है। कुत्तों, बकरियों, सूअरों से बोलता बतियाता। मुखारी करता और बीच बीच में बीड़ी सुलगाता। आज उसके पास एक कुत्ता - नेपुरा बैठा था, पर जवाहिर लाल वह जवाहिर नहीं था, जो सामान्यत: होता था।

मेरी पत्नी जी ने फिर पूछा - डाक्टर को दिखाये? दवाई कर रहे हो? 

उसका उत्तर टेनटेटिव सा था। पूछने पर बताया कि आठ नौ दिन हो गये हैं। डाक्टर के यहां गया था, उसने बताया कि हड्डी नहीं टूटी है। मेरी पत्नीजी ने अनुमान लगाया कि हड्डी वास्तव में नहीं टूटी होगी, अन्यथा चल नहीं पाता। सूजन के बारे में पूछने पर बताया - पहिले एकर डबल रही सूजन। अब कम होत बा। (पहले इसकी डबल सूजन थी, अब कम हो रही है।)

मैने सोचा, उसकी कुछ सहायता कर दूं। जेब में हाथ गया तो पर्स में कोई छोटा नोट नहीं मिला। पांच सौ रुपया था। एक बार विचार आया कि घर जा कर उसे सौ-पचास भिजवा दूं। फिर मन नहीं माना। उसे वह नोट थमा दिया - क्या पता घर जाते जाते विचार बदल जाये और कुछ भी न देना हो!

पत्नीजी ने इस कदम का मौन समर्थन किया। जवाहिरलाल को धमकाते हुये बोलीं - पी मत जाना, सीधे सीधे डाक्टर के पास जा कर इलाज कराना।

जवाहिरलाल ने पैसा लेते हुये हामी भरी। पत्नीजी ने हिदायत दुबारा री-इटरेट की। हम लोग घर लौटे तो जेब हल्की थी, मन जवाहिर की सहायता कर सन्तोषमय था। ... भगवान करें, जल्दी ठीक हो जाये जवाहिरलाल। [slideshow]

Monday, July 23, 2012

ज्ञान धर दुबे

मेरे समधी हैं श्री ज्ञान धर दुबे। मिर्जापुर के पास धनावल गांव है उनका। एक बरसाती नदी पर जलप्रपात बनता है - बिण्ढ़म फॉल। उससे लगभग तीन किलोमीटर पश्चिम-उत्तर में है उनका गांव। उनकी बिटिया बबिता से मेरे लड़के का विवाह हुआ है पिछले महीने की चौबीस तारीख को। विवाह के बाद कल वे पहली बार अपनी बिटिया (और हम सब से) मिलने आये थे हमारे घर शिवकुटी।

[caption id="attachment_5895" align="alignright" width="800"] हमारे घर आये श्री ज्ञानधर दुबे।[/caption]

श्री ज्ञानधर बहुत संकोची जीव हैं। बहुत ही कम बोलते हैं। उनके साथ उनके ताऊ जी के लड़के श्री सतीश साथ थे और अधिक बातचीत वही कर रहे थे। ज्ञानधर किसान हैं और जैसा लगता है, पूरी मेहनत से किसानी करते हैं। उनके पास एक ट्रेक्टर है - नया ही है। मैने पूछा कि उनकी खेती के अतिरिक्त ट्रेक्टर कितना काम करता है? अपना सवाल मुझे सही उत्तर के लिये री-मार्शल भी करना पड़ा। उनका जवाब था कि जितना समय वे अपनी खुद की खेती पर देते हैं, उतना ही ट्रेक्टर प्रबन्धन पर भी लगता है। वे सवेरे नौ बजे से काम पर लग जाते हैं और दोपहर के भोजन के समय एक घण्टा आराम के अलावा सूर्यास्त तक काम पर रहते हैं। यह जरूर है कि किसानी के लिये कई ज्यादा गतिविधि के समय होते हैं, और कई आराम के। यह फसल रोपाई का समय है - कस कर मेहनत करने का समय!

श्री ज्ञानधर मेहनती भी हैं और दूसरो की सहायता करने वाले भी। मुझे याद है कि एक बात, जिसके आधार पर मैने उनके परिवार से सम्बन्ध करने का निर्णय लिया था, वह थी बबिता का यह कहना कि उसके पिताजी रात बिरात भी अपने आस पास वालों की सहायता करने को तत्पर रहते हैं।

मैने ज्ञानधर जी से कहा कि गांव में रहने के अपने आकर्षण हैं। मेरे पिताजी ने टोका - गांव में बीमार होने पर इलाज करा पाना मुश्किल है। इसपर श्री ज्ञानधर का स्वत: स्फूर्त उत्तर था - पर गांव में आदमी बीमार भी कम होता है। कई लोग उनके कहे से सहमत न हों, पर जब मैं अपनी सात दवा की गोलियां सवेरे और तीन शाम को लेने की बात याद करता हूं, तो लगता है कि कहीं न कहीं उनकी बात में सच्चाई है।

उनके गांव में दिन में दो-तीन घण्टा बिजली आती है। घर के पास लगभग ६००-८०० मीटर तक पक्की सड़क नहीं है। किसानी के बाद अनाज रोक कर रखना - तब तक, जब तक दाम अच्छे न मिलें, उनके लिये बहुधा सम्भव नहीं होता। फिर भी, उनकी जीवन शैली मुझे ललचाती नजर आती है। उसमे एक विविधता पूर्ण अन्तर है और अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को कम करने की बाध्यता भी। दोनो में अपनी चुनौती भी है और एक तरह की मोनोटोनी तोड़ने का कम्पल्शन भी।
मुझे याद है कि एक बात, जिसके आधार पर मैने उनके परिवार से सम्बन्ध करने का निर्णय लिया था, वह थी बबिता का यह कहना कि उसके पिताजी रात बिरात भी अपने आस पास वालों की सहायता करने को तत्पर रहते हैं।

मेरे आस पार रेल की पटरियां हैं। उनके पास बिण्ढ़म और टाण्डा फॉल हैं, सिरसी डैम है, उत्तर में गंगा नदी हैं और दक्षिण में शोणभद्र...। मेरे पास सभ्यता की जंजीरें हैं, उनके पास प्रकृति का खजाना...

खैर, मैं मैं रहूंगा और ज्ञानधर ज्ञानधर रहेंगे। ज्ञानदत्त ज्ञानधर नहीं हो सकते। पर ज्ञानदत्त के पास सपने देखने की आजादी है, जो (शायद) जायेगी नहीं...

[caption id="attachment_5897" align="alignright" width="584"] गूगल अर्थ पर बिण्ढ़म फॉल का दृष्य। यह स्थान श्री ज्ञानधर दुबे के गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर है।[/caption]

Thursday, July 19, 2012

रतलाम की सड़क पर

[caption id="attachment_5871" align="alignright" width="300"] रतलाम स्टेशन का अन्दरूनी दृष्य। फुट ओवर ब्रिज स्टेशन के आरपार जाता है। पहले यह प्लेटफार्म पर नहीं उतरता था, अब यह उतरता है![/caption]

हमारे पास एक डेढ़ घण्टे का समय था और एक वाहन। सड़क पर घूमते हुये रतलाम का नौ वर्ष बाद का अहसास लेना था। आसान काम नहीं था - जहां चौदह-पन्द्रह साल तक पैदल अनन्त कदम चले हों वहां वाहन में डेढ़ घण्टे से अनुभूति लेना कोई खास मायने नहीं रखता। पर जैसे पकते चावल का एक टुकड़ा देख-दबा कर समूचे पतीले का अन्दाज लगाया जाता है, हमने वही करने का यत्न किया।

रतलाम स्टेशन पहले की तुलना में अधिक साफ और सुविधा सम्पन्न लगा। यह भी हो सकता है कि हमने भीड़ के समय प्लेटफार्म पर चहलकदमी नहीं की, अन्यथा गन्दगी दीखती। पहले छप्पनियां (५६अप) या मामा-रेल (१३०/१२९ पेसेन्जर) के समय भील लोगों की उपस्थिति में बहुत भीड़ होती थी। रात में भील लोग प्लेटफार्म पर ही सोते-जागते दीखते थे। अब जब स्टेशन देखा, तो साफ और रंग-रोगन से चमकता दीखा। स्टॉल भी पहले की अपेक्षा अधिक सामान के साथ और साफ नजर आये। प्लेटफार्म पर गाय बैल बकरी नहीं थे, जो पहले हुआ करते थे। यद्यपि स्टेशन के बाहर जरूर दीखे - सांड़ भी थे जो बनारस के टच की कमी मालवा के रतलाम में पूरी कर रहे थे।

स्टेशन के घोड़े (सज्जन सिंह बहादुर की चौराहे की घोड़े पर सवारी करती प्रतिमा) तक सड़क पहले की अपेक्षा ज्यादा चौड़ी और साफ थी। फ्रीगंज की सड़क भी पहले की अपेक्षा चौड़ी और साफ नजर आयी। मुझे बताया गया कि रेलवे मालगोदाम के ट्रक अब फ्रीगंज से आते जाते हैं - सो स्टेशन की सड़क पहले से ज्यादा खुली और हवादार लगी। कन्हैया (वाहन चालक) ने बताया कि कभी एक गार्ड साहब को एक ट्रक ने जख्मी कर दिया था। उसी के बाद मालगोदाम के ट्रक स्टेशन रोड से बन्द कर दिये गये। भला हो उन गार्ड साहब का...

कालिका माता मन्दिर का परिसर तो बहुत ही शानदार था, पहले की तुलना में। मन्दिर के पास का कुण्ड - जिसमें कभी सड़ते पानी की बदबू आया करती थी, अब स्वच्छ जल युक्त था और उसमें बीचोबीच फौव्वारा भी चल रहा था। बच्चों के मैरी-गो-राउण्ड और खिलौना गाड़ियां भी पहले से ज्यादा चमकदार लगे। एक परिवार कालिकामाता मन्दिर के सामने अपनी नयी मोटर साइकल की पूजा करवा रहा था। माता का आशीर्वाद उनकी मोटरसाइकल और उन्हे सुरक्षित रखे...

हम तीन दुकानों पर गये - एक था मेवाड़ स्टोर। यहां मुस्लिम दुकानदार और उनका लड़का बन्धेज के सूट के कपड़े बेंचते हैं। अधेड़ दुकानदार मेरी पत्नीजी को पहचान गये और मुझे भी। बार बार पूछ भी रहे थे कि मैं वापस यहीं पदस्थ हो कर आ गया हूं, क्या? वे और उनका लड़का बार बार कह रहे थे कि हम में कोई खास फर्क नहीं देखते वे उम्र के प्रभाव का (मेरे ख्याल से वे सही नहीं थे, पर हमने इसे कॉम्प्लीमेण्ट की तरह लिया)। मेवाड़ स्टोर वाले अपना बंधेज का सामान जोधपुर से लाते हैं। वहां उनके रिश्तेदार हैं। इस हिसाब से स्टोर को तो मारवाड़ स्टोर होना चाहिये था...

उमेश किराना स्टोर, जहां से हम किराने का सामान लिया करते थे और मैं पैदल चलते हुये वहां जाया करता था, एक छोटी सी दुकान है। उमेश मिल गये। उनका वजन पहले से बढ़ा हुआ था। वे हमें देख बहुत प्रसन्न हुये। बार बार आग्रह करने लगे कि शाम का भोजन उनके घर पर लें हम। बड़ी कठिनायी से हमने उन्हे मनाया कि भोजन तो मेरी अस्वस्थता के कारण हम कहीं कर नहीं पायेंगे। आतिथ्य के रूप में उमेश से हमने इलायची और टॉफी ग्रहण की। उनकी दुकान से चलते समय मेरी आंख का कोई कोना नम था...

जलाराम की दुकान से हमने दो महीने के लिये पर्याप्त नमकीन, मेथी की पूरी, सींगदाना आदि खरीदे। रतलाम में रहते हुये नमकीन हम उन्ही की दुकान से लिया करते थे। दुकान पहले से दुगनी बड़ी हो गयी थी। सर्वानन्द का जनरल स्टोर भी अब दो मंजिला हो गया है। उसमें एक चक्कर लगाने का मन था, पर समयाभाव के कारण वह टाल दिया।

डाट की पुलिया से रतलाम रहते रोज गुजरना हुआ करता था। सर्दियों के मौसम में मैं एक अमरूद खरीद कर खाते खाते पैदल दफ्तर आया जाया करता था - तब मेरे साथ के सभी अफसर वाहन से आते जाते थे। अत: डाट की पुलिया से मैं शायद सबसे ज्यादा पैदल गुजरने वाला अफसर हो सकता हूं। डाट की पुलिया यथावत दीखी। कन्हैया ने बताया कि पुलिया का एक और बुगदा (सुरंग) बनाने का प्लान था, पर वह हुआ नहीं। आगे शायद बन जाये। शायद न भी बने - बनने के लिये मुझे आस पास ज्यादा जमीन नजर नहीं आती।

हम रेलवे कालोनी के अन्त तक गये। चौदह नम्बर की सड़क के किनारे नमकीन मिठाई की दुकान देखने का मन था - जहां पहले एक मोटी तोंद और छोटी बनियान वाला काला भुजंग बद शक्ल हलवाई हुआ करता था और जिसकी दुकान से बहुत जलेबी हमने खाई थी। वह दुकान या तो बन्द थी, या गायब। उसके पास महू बेकरी जरूर दिखी।

कालोनी की सड़क पहले से कहीं अच्छी दशा में थी। कालोनी के अन्त में परफेक्ट पॉटरीज की बन्द फैक्टरी अभी भी कायम थी - उसकी जमीन की प्लॉटिंग हो कर रिहायशी क्षेत्र नहीं बढ़ा था और उसके दरवाजे पर विशाल बरगद का पेड़ अब भी कायम था।

रेलवे कालोनी में जब हम रहते थे, तो बच्चों के खेलने के पार्क की अधूरी योजना बरसों से चल रही थी। अब मैने एक अच्छा पार्क बने देखा।

समय काफी लग गया था। हम जल्दी स्टेशन वापस लौटे। रास्ते में स्टेशन रोड पर खण्डेलवाल की रतलामी सेव की दुकान यथावत चल रही थी, जिसपर नमकीन झारने वाला कारीगर वैसे ही काम कर रहा था, जैसा मै यहां से स्थानान्तरण के समय छोड कर गया था।

रतलाम वैसा ही है - रतलामी सेव अनवरत बनाता। पर पहले से ज्यादा साफ सुथरा। मन होता है यहीं एक फ्लैट ले कर रिटायरमेण्ट के बाद रहा जाये। पर मन की क्या चलती है?

[यह १६ जुलाई के दिन का भ्रमण था। बारिश का मौसम होने के कारण रतलाम की धूल और वातावरण में कम नमी नहीं मिली, अन्यथा वहां मैं श्वांस की समस्या से परेशान रहता था।

उसके बाद कल हम इलाहाबाद लौट आये।

हम लोग सन १९८५-१९९५ और फिर १९९८-२००३ के बीच रतलाम रहे थे।]

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Tuesday, July 17, 2012

कारू मामा की कचौरी

कल सवेरे मंसूर अली हाशमी जी रतलाम स्टेशन पर मिलने आये थे, तो स्नेह के साथ लाये थे मिठाई, नमकीन और रतलाम की कचौरियां। मैं अपनी दवाइयों के प्रभाव के कारण उदर की समस्या से पीड़ित था, अत: वह सब खोल कर न देखा। शाम के समय जब विष्णु बैरागी जी मिले तो उन्होने अपने “बतरस” में मुझे स्पष्ट किया कि हाशमी जी कारू राम जी की कचौरियां दे गये हैं और जानना चाहते हैं कि मुझे कैसी लगीं?

[caption id="attachment_5863" align="alignleft" width="584"] मंसूरअली हाशमी जी मुझसे मिलने आये। उनके मोबाइल से लिया चित्र जो मैने फेसबुक से डाउनलोड कर टच-अप किया है।[/caption]

कारूराम जी की कचौरियों के बारे में उन्होने बताया कि रतलाम में कसारा बाजार में कारू राम जी की साधारण सी दुकान है। कारूराम जी (कारूमामा या कारू राम दवे) समाजवादी प्राणी थे। उन्हे लोगों को बना कर खिलाने में आनन्द आता था। सत्तर के दशक की घटना बैरागी जी बता रहे थे कि २५ कचौरियां-समोसे मांगने पर कारूमामा ने तेज स्वरों में उनको झिड़क दिया था – “देख, ये जो कचोरियां रखी हैं न, वे एक दो कचौरी लेने वाले ग्राहकों के लिये हैं, पच्चीस एक साथ ले जाने वाले ग्राहक के लिये नहीं। तू भाग जा!”

[caption id="attachment_5862" align="alignleft" width="584"] हाशमी जी की लाई कारू मामा की कचौरी और समोसा।[/caption]

अनुमान लगाया जा सकता है कि कारू मामा कैसे दुकानदार रहे होंगे। बैरागी जी ने बताया कि अब कारू मामा की अगली पीढ़ी के लोग उन्ही उसूलों पर अपनी दुकान चला रहे हैं। उनकी दुकान पर जा कर लगता है कि पच्चीस पचास साल पीछे चले गये हैं काल-खण्ड में।

कैसे रहे होंगे कारू मामा? बैरागी जी की मानें तो अक्खड़ थे, कड़वा भी बोलते थे, पर लोग उस कड़वाहट के पीछे सिद्धान्तों पर समर्पण और स्नेह समझते थे। पैसा कमाना उनका ध्येय नहीं था – वे आटे में नमक बराबर कमाई के लिये दुकान खोले थे – दुकान से घाटा भी नहीं खाना था, पर दुकान से लखपति (आज की गणना में करोड़पति) भी नहीं बनना था।

अच्छा हुआ, मंसूर अली हाशमी जी कारू मामा की कचौरी (और समोसे) ले कर आये। अन्यथा इतने वर्षों रतलाम में रहने पर भी उन जैसी विभूति के बारे में पता नहीं चला था और अब भी न चलता…

कचौरी कैसी थीं? मेरी पत्नीजी का कहना है कि रतलाम में बहुत दुकानों की कचौरियां खाई हैं। यह तो उन सबसे अलग, सब से बढ़िया थीं। भरे गये मसाले-पीठी में कुछ बहुत खास था…

[caption id="attachment_5861" align="alignleft" width="584"] मुझसे शाम के समय मिलने आये श्री विष्णु बैरागी जी।[/caption]

Tuesday, July 3, 2012

प्रयाग फाटक का मोची

मैं उससे मिला नहीं हूं। पर अपने दफ्तर आते जाते नित्य उसे देखता हूं। प्रयाग स्टेशन से जब ट्रेन छूटती है तो इस फाटक से गुजर कर फाफामऊ जाती है। फाटक की इमारत से सटी जमीन पर चबूतरा बना कर वह बैठता है।

सवेरे जाते समय कई बार वह नहीं बैठा होता है। शाम को समय से लौटता हूं तो वह काम करता दिखता है। थोड़ा देर से गुजरने पर वह अपना सामान संभालता दिखता है। पता नहीं, अकेला रहता है या परिवार है इलाहाबाद में। अकेला रहता होगा तो शाम को यहां से जाने के बाद अपनी रोटियां भी बनाता होगा!

वह  जूते मरम्मत/व्यवस्थित करता है, मैं माल गाड़ियों की स्थिति ले कर उनका चलना व्यवस्थित करता हूं। शाम होने पर मुझे भी घर लौटने की रहती है। बहुत अन्तर नहीं है मुझमें और उसमें। अन्तर उसी के लिये है जो अपने को विशिष्ट जताना चाहे और उसकी पहचान बचा कर रखना चाहे।

अन्यथा, उसके आसपास से ट्रेनें गुजरती हैं नियमित। मेरे काम में ट्रेनों का लेखा-जोखा है, नियमित। मुझे तो बहुत समय तक सीटी न सुनाई दे ट्रेन की, तो अजीब लगता है। इस प्रयाग फाटक के मोची को भी वैसा ही लगता होगा।

मेरे जैसा है प्रयाग फाटक का मोची। नहीं?

[caption id="attachment_5853" align="alignleft" width="584"] प्रयाग फाटक का मोची[/caption]
[caption id="attachment_5856" align="alignleft" width="584"] प्रयाग फाटक का मोची जुलाई ५ को सवेरे पौने दस बजे बैठा मिला। बारिश (या धूप?) की आशंका से तिरपात लगाये था।[/caption]

Tuesday, June 26, 2012

सुशील की गुमटी

[caption id="attachment_5837" align="alignright" width="300"] चील्ह में सुशील की गुमटी, पास में अजय खड़ा है।[/caption]

हम लोग मेरे लड़के के विवाह के लिये मिर्जापुर की ओर बढ़ रहे थे। कई कारों में परिवार के लोग। परस्पर मोबाइल सम्प्रेषण से तय पाया गया कि गोपीगंज के आगे चील्ह में जहां गंगाजी का पुल पार कर मिर्जापुर पंहुचा जाता है, वहां रुक कर चाय पीने के बाद आगे बढ़ा जायेगा।

चील्ह में सभी वाहन रुके। एक गुमटी वाले को चाय बनाने का आर्डर दिया गया। गुमटी पान की थी, पर वह चाय भी बनाता था। गुमटी में पान मसाला के पाउच नेपथ्य में लटके थे। एक ओर बीकानेरी नमकीन के भी पाउच थे। सामने पान लगाने की सामग्री थी।

[caption id="attachment_5838" align="aligncenter" width="584"] सुशील की गुमटी की मुख्य आमदनी पान और चाय से है।[/caption]

चाय इतने बड़े कुल्हड़ में वह देता था, जिससे छोटे कुल्हड़ शायद बना पाना एक चुनौती हो कुम्हार के लिये। एक टीन के डिब्बे में कुल्हड़ रखे थे। मैने उससे पूछा - कितने के आते हैं ये कुल्हड़?

[caption id="attachment_5842" align="alignleft" width="225"] इससे छोटा कुल्हड बनाना शायद चुनौती हो कुम्हार के लिये! :-)[/caption]

अपनी दुकान की चीजों की लागत बताने में हर दुकानदार थोड़ा झिझकता है, वैसे ही यह भी झिझका। फिर बोला - बीस रुपये सैंकड़ा की सप्लाई होती है।

दिन भर में कितने इस्तेमाल हो जाते हैं?

कोई कोई दिन दो सौ। कोई कोई दिन तीन सौ।

तब तो तुम्हारी ज्यादा आमदनी चाय से होती होगी? पान से भी होती है? 

वह युवा दुकानदार अब मुझसे खुल गया था। बोला - चाय से भी होती है और पान से भी।

मैने पीछे लगे पानमसाला के पाउच दिखा कर कहा - इनसे नहीं होती?  " इनसे अब बहुत कम हो गई है। पहले ज्यादा होती थी, तब ये आगे लटकाते थे हम, अब पीछे कर दिये हैं। अब दो तीन लड़ी बिक पाती हैं मुश्किल से।"

उसे मैने सुप्रीम कोर्ट के आदेश - पानमसाला प्लास्टिक के पाउच में नहीं बेचा जा सकता - के बारे में बताया। "अभी भी पूरी तरह कागज का पाउच नहीं है। कागज के पीछे एक परत है किसी और चीज की।" - उसने मुझे एक पाउच तोड़ कर दिखाते हुये कहा।

उसकी चाय अच्छी बनी थी - आशा से अधिक अच्छी। दाम भी अच्छे लिये उसने - चार रुपये प्रति छोटा कुल्हड। पर देने में कोई कष्ट नहीं हुआ हम लोगों को - बारात में जाते समय पर्स का मुंह वैसे भी आसानी से खुलने लगता है!

चलते चलते मैने उससे हाथ मिलाया। नाम पूछा। सुशील।

उससे आत्मीयता का परिणाम यह हुआ कि जब हम अगले दिन विवाह के बाद लौट रहे थे तो पुन चील्ह में चाय पीने सुशील की गुमटी पर रुके। जाते समय सांझ हो गयी थी, सो गुमटी का चित्र नहीं लिया था। आते समय सवेरे के नौ बज रहे थे। चित्र साफ़ आया।

साथ चलते अजय ने पूछा - अब सुशील भी ब्लॉग पर आ जायेगा?

मैने जवाब दिया - देखता हूं। ब्लॉग आजकल उपेक्षित सा पड़ा है। उसपर जाता है सुशील या फ़ेसबुक या ट्विटर पर। अन्तत: पाया कि सुशील "मानसिक हलचल" पर ही जमेगा।

[caption id="attachment_5839" align="aligncenter" width="584"] चाय बनाने के लिये दूध निकालता सुशील।[/caption]

Tuesday, June 12, 2012

कल्लू के उद्यम

[caption id="attachment_5826" align="aligncenter" width="584"] कल्लू के कुत्ते चरती भैसों को भगा रहे थे। लोग गंगास्नान कर लौट रहे थे।[/caption]

बहुत दिनों बाद कल्लू दिखा कछार में। गंगा दशहरा के पहले ही उसके खेतों का काम धाम खत्म हो गया था। अब वह सरसों के डण्ठल समेटता नजर आया। उसके साथ दो कुत्ते थे जो कछार में चरती भैसों को भौंक कर भगा रहे थे। लोग स्नान कर आ जा रहे थे। मुझे कल्लू का दीखना अच्छा लगा। दूर से ही हमने हाथ हिला कर परस्पर अभिवादन किया। फ़िर मैं रास्ता बदल कर उसके पास गया।

[caption id="attachment_5827" align="aligncenter" width="584"] कल्लू सरसों के डण्ठल समेटता नजर आया।[/caption]

क्या हाल है?

जी ठीक ही है। खेत का काम धाम तो खत्म ही हो गया है। यह (डण्ठल की ओर इशारा कर) बटोर रहा हूं। जलाने के काम आयेगा।

हां, अब तो बरसात के बाद अक्तूबर नवम्बर में ही शुरू होगा फिर से सब्जी बोने का कार्यक्रम? 

देखिये। अगले मौसम में शायद वैसा या उतना न हो। अभी तो सब्जी की फ़सल अच्छी हो गयी थी। आने वाले मौसम में तो कुम्भ भी लगना है। घाट पर जाने के लिये ज्यादा रास्ता छोड़ना होगा। भीड़ ज्यादा आयेगी तो खेती कम होगी।

कल्लू ने स्वत: बताना शुरू किया। अभी तो वह लीची का ठेला लगा रहा था। लीची का मौसम उतार पर है। एक बारिश होते ही वह खत्म हो जायेगी। फ़िर सोचना होगा कि क्या किया जाये। प्याज और लहसुन का ठेला लगाने का मन है। "यही सब काम तो हैं हमारे लिये"।

मैं सोचने लगा - कल्लू की माली दशा औरों से बेहतर है। उसके पास उद्यम के बेहतर विकल्प हैं। सब्जी बोने में भी वह खाद देने और पम्पिंग सेट से सिंचाई करने के बेहतर प्रयोग कर लेता है। ठेले लगाने में भी उसके पास औरों की अपेक्षा बेहतर बार्गेनिंग पावर होगी।

मुझे कल्लू अच्छा लगता है। जिस तरह से वह मुझसे बेझिझक बात करता है, उससे लगता है कि वह भी मुझे अच्छा समझता होगा। देखते हैं वह अगली बार क्या करता है। उससे कब और कहां मुलाकात होती है - कछार में सब्जी उगाते या ठेले पर सब्जी बेचते।

[caption id="attachment_5828" align="aligncenter" width="584"] कल्लू, सूखा भूसा/डण्ठल और उसके कुत्ते।[/caption]

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कल जवाहिरलाल को अपने लड़के के तिलक की पत्रिका मैने दी, शिवकुटी घाट के पास। जवाहिरलाल ने ध्यान से देखी पत्रिका। एक बहुत आत्मीय सी मुस्कान दी मुझे और फ़िर वह पत्रिका पण्डाजी के पास सहेज कर रखने चला गया।




[caption id="attachment_5832" align="aligncenter" width="450"] जवाहिरलाल ने तिलक की पत्रिका हाथ में ली।[/caption]

[caption id="attachment_5833" align="aligncenter" width="584"] पत्रिका ध्यान से देखी।[/caption]

[caption id="attachment_5834" align="aligncenter" width="584"] और फ़िर उसे सहेज कर रखने पण्डाजी की चौकी की ओर चल दिया।[/caption]