Friday, August 10, 2012

टूण्डला - एतमादपुर - मितावली - टूण्डला

टूण्डला से आगरा जाने की रेल लाइन पर अगला स्टेशन है एतमादपुर। और टूण्डला से दिल्ली जाने के रास्ते में पहला स्टेशन है मितावली। इन तीनों स्टेशनों को जोडने वाला एक रेल लाइन का त्रिभुज बनता है। मैंने आठ अगस्त को उस त्रिभुज की यात्रा की।

[caption id="attachment_6045" align="aligncenter" width="584"] गूगल अर्थ पर दिखता रेल पटरियों का टूण्डला-एतमादपुर-मितावली का त्रिभुज।[/caption]

टूण्डला से हम एक पुश-ट्रॉली पर रवाना हुये। पुश ट्रॉली को चार व्यक्ति धक्का देते हैं चार पहियों की यह ट्रॉली जब पर्याप्त गति पकड़ लेती है तो वे उछल कर ट्रॉली पर सवार हो जाते हैं। जब ट्रॉली रुकने लगती है तो वे पुन: उतर कर धक्का लगाते हैं। इस तरह यह ट्रॉली औसत २०-२५ किमीप्रघ की रफ्तार से चलती है। हमारी ट्रॉली पर धक्का लगाने वाले छरहरे बदन के स्वस्थ लोग थे। उनमें से एक अधेड़ था और वाचाल भी। वह बीच बीच में स्थान के बतौर गाइड अपनी टिप्पणियां भी करता जा रहा था। उससे काफी जानकारी मिली।

टूण्डला से एतमादपुर के रास्ते में सरपत की बड़ी बड़ी घास है ट्रैक के दोनो ओर। उनमें से निकल कर जीव ट्रैक पार करते दिखे। तीन जगह तो विषखोपड़ा (गोह की प्रजाति का जीव - साइज में काफी बड़ा - लगभग पौना मीटर लम्बा) सरसराता हुआ पटरी पार कर गया हमारे आगे। एक जगह एक पतला पर काफी लम्बा सांप गुजरा। यूं लगा कि टूण्डला से बाहर निकलते ही अरण्य़ प्रारम्भ हो गया हो।

[caption id="attachment_6053" align="aligncenter" width="584"] टूण्डला से निकलते ही ऊंची ऊंची घास दिखी ट्रैक के किनारे।[/caption]

टूण्डला एक छोटा कस्बा जैसा स्थान है। इसका अस्तित्व रेलवे का एरिया ऑफिस होने के कारण ही है। हमारे डिविजनल ट्रैफिक मैनेजर श्रीयुत श्रीकृष्ण शुक्ल, जो टूण्डला में नियुक्त हैं और मेरे साथ थे, ने बताया कि टूण्डला की बाजार की अर्थव्यवस्था रेलवे स्टाफ की लगभग बीस-पच्चीस करोड़ की सालाना सेलेरी पर निर्भर है। उसके अलावा कोई उद्योग यहां नहीं है। इस जगह के आसपास के किसान (टूण्डला-फिरोज़ाबाद-इटावा-मैनपुरी का इलाका) जरूर आलू की पैदावार से सम्पन्न हैं। अत: इलाके में कई कोल्ड स्टोरेज मिल जायेंगे। इस इलाके में आलू के चिप्स की युनिटें और आलू से बनने वाली शराब की ब्रुवरी लगाने की सम्भावनायें है। इसके अलावा डेयरी के लिये पशुपालन और उनके लिये चारा बोने का प्रचलन है आस पास के गांवों में - ऐसा श्रीकृष्ण ने बताया।

पर मुझे आस पास की कृषि भूमि पर छुट्टा घूमते बहुत स्वस्थ नीलगाय दिखे। हमारे विद्युत अभियन्ता श्री ओम प्रकाश पाठक ने बताया कि नीलगाय के ट्रैक पर आने और इन्जन से टकराने के कारण इन्जन फेल होने की घटनायें बहुत होती हैं।

मेरे पास अच्छा कैमरा न होने के कारण विषखोपड़ा, सांप या नीलगाय के चित्र नहीं ले पाया। पर उनके चित्र जेहन में गहरे से उतर गये। ये जीव जितने भयानक थे, उतने ही सुन्दर भी। एतमादपुर से मितावली के बीच मुझे एक दो पेड़ों पर बया के ढेरों घोंसले दिखे।  पुश ट्रॉली रुकवा कर मैने पेड़ के पास जा कर उनके चित्र लेने चाहे तो एक ट्रॉली मैन आगे आगे चला। वास्तव में घास के बीच कुछ सरसराता हुआ आगे चला गया। एक बड़ा जानवर - शायद नीलगाय भी आगे चरी के खेत में जाता दिखा। घास में बहुत से भुनगे-टिड्डे उड़ते दिखे। अगर वह ट्रॉली मैन आगे न होता तो मैं आगे के गढ्ढे को भांप न पाता और एकबारगी तो उसमें गिर ही जाता।

[caption id="attachment_6058" align="aligncenter" width="584"] पेंड पर लगे बया के घोंसले।[/caption]

खैर, बया के घोंसलों के चित्र ले ही लिये - यद्यपि थोड़ा दूर से। ट्रॉली मैन ने बया का एक घोंसला तोड़ कर लाने का प्रस्ताव रखा - पर मैने जोर दे कर मना कर दिया - किसी का घर उजाड़ना कोई अच्छी बात थोड़े ही है।

मितावली और टूण्डला के बीच नेशनल हाईवे अथॉरिटी के इन्जीनियर रेल के ऊपर रोड ओवर ब्रिज के निर्माण के लिये ट्रैक का ब्लॉक ले कर काम कर रहे थे। उन्होने बताया कि अभी सत्तर-सत्तर मिनट के बीस पच्चीस ब्लॉक की और जरूरत पड़ेगी। ब्लॉक निर्धारण का अधिकार श्रीकृष्ण के पास है। अत: इस दौरान उन्होने हमसे बहुत मैत्री युक्त बातचीत की।

[caption id="attachment_6056" align="aligncenter" width="584"] रोड ओवर ब्रिज के नीचे नेशनल हाईवे अथॉरिटी के इन्जीनियर्स से पुश ट्रॉली से उतर कर बात करते श्रीयुत श्रीकृष्ण शुक्ल।[/caption]

टूण्डला आने के पहले एक बड़ा कैम्पस दिखा - डा. जाकिर हुसैन इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी एण्ड मैनेजमेण्ट। भव्य बिल्डिंग। उसका बोर्ड बता रहा था कि ZHITM के १५ कैम्पस, २० कोर्सेज और पच्चीस हजार से अधिक विद्यार्थी हैं। ... आज कल इस तरह के सन्थानों की जो दशा है, उसके अनुसार इन पच्चीस हजार में से कम से कम बाईस हजार विद्या की अर्थी ढोने वाले ही होंगे, विद्यार्थी नहीं।

खाड़ी के देशों की कमाई से खड़े किये गये ये सन्थान, जिनमें बिल्डिंग है पर अन्य इन्फ्रॉस्ट्रक्चर नगण्य़ है और फेकेल्टी को छ से दस हजार की मासिक सेलरी पर रखा जाता है - उनसे गुणवत्ता की क्या अपेक्षा की जा सकती है?

[caption id="attachment_6048" align="aligncenter" width="584"] डा. जाकिर हुसैन इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी एण्ड मैनेजमेण्ट का कैम्पस।[/caption]

टूण्डला के बाहर माननीय कांसीराम आवास योजना के अन्तर्गत बनते मकानों का परिसर भी नजर आया। शहर से पांच किलोमीटर दूर। यह परिसर दुकानों, स्कूल, डिस्पेंसरी आदि की सुविधाओं से लैस होगा। पर यहां रहने वाले लोगों को आजीविका के लिये अगर टूण्डला आना जाना हुआ तो उनका काफी पैसा और समय कम्यूटिंग में लग जायेगा। खैर, बनता हुआ परिसर अच्छा लग रहा था। पता नहीं, समाजवादी पार्टी की नयी सरकार परियोजना को धीमा न कर दे!

[caption id="attachment_6049" align="aligncenter" width="584"] टूण्डला के बाहर माननीय कांसीराम आवास योजना के अन्तर्गत बनते मकान।[/caption]

पूरी पुश ट्रॉली यात्रा के अन्त में टूण्डला यार्ड में एक अठपहिया ब्रेकवान दिखा। यह ब्रेकवान निश्चय ही मालगाड़ी के गार्ड साहब की यात्रा पहले के चारपहिया ब्रेकवान की उछलती हिचकोले खाती और शरीर के पोर पोर को थकाती जिन्दगी से बेहतर बना देगी। उत्तरोत्तर ये ब्रेकवान बढ़ रहे हैं, पुराने चार पहिया वालों को रिप्लेस करते हुये।

[caption id="attachment_6050" align="aligncenter" width="584"] टूण्डला यार्ड में एक मालगाड़ी का आठपहिया ब्रेकवान।[/caption]


Wednesday, August 8, 2012

टूण्डला की पुरानी क्रेन

टूण्डला फिरोज़ाबाद जिले का पुराना रेलवे शहर है। रेलवे लाइन यहां १९वीं सदी के उत्तरार्ध में बनी होगी। तब की इमारतें, वस्तुयें यहां उपलब्ध हैं।

आज यार्ड में घूमते हुये मुझे यह सन् 1879 की हाथ से चलने वाली दस टन की क्रेन दिखी। बहुत सुन्दर। अब निश्चय ही काम में नहीं आती होगी - यद्यपि अभी भी रेल की पटरी पर खड़ी थी।

उसपर उपलब्ध प्लेक के अनुसार वह Cowans Sheldon & Co Ltd द्वारा Carlisle, England में 1879 की बनी है। उसका नम्बर 1001 है।

[caption id="attachment_6035" align="aligncenter" width="584"] 10 Tonne Hand Crane at Tundla[/caption]

[caption id="attachment_6036" align="aligncenter" width="584"] The plaque on Hand Crane[/caption]

सुन्दर लग रही है यह दस टन की हाथ से चलने वाली क्रेन, नहीं? कई महत्वपूर्ण इमारतों के सामने रेलवे वाले नैरो गेज के इंजन लगाते हैं। आर्मी वाले टैंक और एयर फोर्स वाले फाइटर प्लेन। उसी तरह किसी इमारत के सामने यह क्रेन रखी जा सकती है - उसके सामने का अच्छा व्यू देने के लिये!


Monday, August 6, 2012

डाटा

जब (सन् 1984) मैने रेलवे सर्विस ज्वाइन की थी, तब रेलवे के यार्ड और स्टेशनों से ट्रेन चलने का डाटा इकठ्ठा करने के लिये ट्रेन्स क्लर्क दिन रात लगे रहते थे। एक मालगाड़ी यार्ड में आती थी तो वैगनों का नम्बर टेकर पैदल चल कर उनके नम्बर उतारता था। यार्ड के दफ्तर में हर आने जाने वाली गाड़ी का रोजनामचा हाथ से भर जाता था। वैगनों का आदानप्रदान जोड़ा जाता था। हर आठ घण्टे की शिफ्ट में उसकी समरी बनती थी। इसी तरह ट्रेनों के आने जाने का हिसाब गाड़ी नियन्त्रक हाथ से जोड़ते थे।

मैने इलेक्ट्रानिक्स इन्जीनियरिंग पढ़ी थी अपने एकेडमिक लाइफ में। पर यहां मैने जल्दी जल्दी पूरा प्रयास कर वह दिमाग से इरेज़ कर आठवीं दर्जे का जोड़-बाकी-गुणा-भाग री-फ्रेश किया। उससे ज्यादा का ज्ञान ट्रेन चलाने में काउण्टर प्रोडक्टिव था।

हर रोज इतना अधिक डाटा (आंकड़े) से वास्ता पड़ता था (और अब भी पड़ता है) कि डाटा के प्रति सारी श्रद्धा वाष्पीकृत होने में ज्यादा समय नहीं लगा था मुझे।

 बहुत सारा और बहुत एक्यूरेट डाटा हमसे बहुत कुछ चूस रहा है। यह बेहतर मैनेजर तो नहीं ही बना रहा। और नेतृत्व की भूत काल की ब्रिलियेंस भी अब नजर नहीं आती। शिट! आई एम मोर इनफॉर्म्ड, बट एम आई मोर अवेयर? एम आई मोर कॉन्फीडेण्ट ऑफ माईसेल्फ?



उस जमाने में डाटा को लेकर मन में विचार बनता था कि जितनी वर्जिनिटी की अपेक्षा एक प्रॉस्टीट्यूट से की जा सकती है, उतनी डाटा से करनी चाहिये। पर उस डाटा से भी जितने काम के मैनेजमेण्ट निर्णय हम ले पाते थे, वह अपने आप में अद्भुत था।

अब समय बदल गया है। ट्रेन रनिंग के सारे आंकड़े रीयल टाइम बनते हैं। उनमें हेर फेर करना बहुत कठिन काम है - और उसके लिये जिस स्तर के आर्ट की जरूरत होती है, वह आठवीं दर्जे के गणित की बदौलत नहीं आ सकता। उससे ज्यादा की अपनी केपेबिलिटी नहीं बची। :sad:

[caption id="attachment_6027" align="alignleft" width="800"] माल यातायात की सूचना प्रणाली का पोर्टल। यह इतना ज्यादा डाटा (सूचना के आंकड़े - कच्चे और परिष्कृत/प्रॉसेस्ड) देता है कि सिर भन्ना जाये! :-)[/caption]

बहुत सारा और बहुत एक्यूरेट डाटा हमसे बहुत कुछ चूस रहा है। यह बेहतर मैनेजर तो नहीं ही बना रहा। और नेतृत्व की भूत काल की ब्रिलियेंस भी अब नजर नहीं आती। शिट! आई एम मोर इनफॉर्म्ड, बट एम आई मोर अवेयर? एम आई मोर कॉन्फीडेण्ट ऑफ माईसेल्फ?

मुझे मालुम है रेलवे में लोग, सिर्फ तर्क देने की गरज से मेरी यह सोच डिनाउंस करेंगे। और मेरा कहना आउट राइट खारिज कर दिया जायेगा। पर बेहतर बात यह है कि रेलवे वाले मेरा ब्लॉग नहीं पढ़ते@।

[@ - रेलवे में तो कोई यह मानता/जानता ही नहीं कि मैं हिन्दी में लिखता हूं! किसी हिन्दी के समारोह में मुझे नहीं बुलाया जाता। जब लोग हिन्दी के फंक्शन में समोसा-पेस्ट्री उडाते अपने ईनाम के लिफाफे जेब में ठूंस रहे होते हैं, मैं अपने आठवीं दर्जे के गणित से गाड़ियां गिन रहा होता हूं, अपने चैम्बर में! :lol: ]

मेरी सारी नौकरी डाटा से काम करते बीत गयी है - अब तक। पर डाटा के प्रति अश्रद्धा उत्तरोत्तर बढ़ती गयी है!


Friday, August 3, 2012

ज़कात कैल्क्युलेटर

मेरे सहकर्मी श्री मंसूर अहमद आजकल रोज़ा रख रहे हैँ। इस रमज़ान के महीने में उपवास का प्रावधान है इस्लाम में - उपवास यानी रोज़ा। सुबह से शाम तक भोजन, जल/पेय और मैथुन से किनारा करने का व्रत।

श्री मंसूर अहमद मेरे डिप्युटी चीफ ऑपरेशंस मैनेजर हैं जो माल यातायात का परिचालन देखते हैं। अगर मैं ब्लॉग/ट्विटर/फेसबुक पर अपनी उपस्थिति बना सकता हूं, तो उसका कारण है कि ट्रेन परिचालन का बड़ा हिस्सा वे संभाल लेते हैं।

[caption id="attachment_5994" align="aligncenter" width="300"] श्री मंसूर अहमद, उप मुख्य परिचालन प्रबन्धक, उत्तर-मध्य रेलवे, इलाहाबाद।[/caption]

कल श्री मंसूर ने सवेरे की मण्डलों से की जाने वाली कॉंफ्रेंस के बाद यह बताया कि इस्लाम में ज़कात का नियम है।

ज़कात अर्थात जरूरतमन्दों को दान देने का इस्लाम का तीसरा महत्वपूर्ण खम्भा [1]। इसमें आत्मशुद्धि और आत्म-उन्नति दोनो निहित हैं। जैसे एक पौधे को अगर छांटा जाये तो वह स्वस्थ रहता है और जल्दी वृद्धि करता है, उसी प्रकार ज़कात (दान) दे कर व्यक्ति अपनी आत्मिक उन्नति करता है।

ज़कात में नियम है कि व्यक्ति अपनी सम्पदा (आय नहीं, सम्पदा) का 2.5% जरूरतमन्द लोगों को देता है। यह गणना करने के लिये रमज़ान का एक दिन वह नियत कर लेता है - मसलन रमज़ान का पहला या दसवां या बीसवां दिन। उस दिन के आधार पर ज़कात के लिये नियत राशि की गणना करने के लिये वैसे ही स्प्रेड-शीड वाला कैल्क्युलेटर उपलब्ध है, जैसा आयकर की गणना करने के लिये इनकम-टेक्स विभाग उपलब्ध कराता है! मसलन आप निम्न लिंक को क्लिक कर यह केल्क्युलेटर डाउनलोड कर देख सकते हैं। वहां ज़कात में गणना के लिये आने वाले मुद्दे आपको स्पष्ट हो जायेंगे। लिंक है -

 ज़कात कैल्क्युलेटर की नेट पर उपलब्ध स्प्रेड-शीट

मैने आपकी सुविधा के लिये यह पन्ना नीचे प्रस्तुत भी कर दिया है। आप देख सकते हैं कि इसमें व्यक्ति के पास उपलब्ध सोना, चान्दी, जवाहरात, नकद, बैंक बैलेंस, शेयर, व्यवसायिक जमीन आदि के मद हैं। इसमें रिहायश के लिये मकान (या अव्यवसायिक जमीन) नहीं आता।

श्री मंसूर ने मुझे बताया कि व्यक्ति, जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या 52 तोला चान्दी के बराबर या अधिक हैसियत है, उसे ज़कात देना चाहिये। लोग सामान्यत: अपने आकलन के अनुसार मोटे तौर पर ज़कात की रकम का आकलन कर दान देते हैं; पर यह सही सही भी आंका जा सकता है केल्क्युलेटर से।


ज़कात देने के बाद उसका दिखावा/आडम्बर की सख्त मनाही है - नेकी कर दरिया में डाल जैसी बात है। यह धारणा भी मुझे पसन्द आयी। [आपके पास अन्य प्रश्न हों तो मैं श्री मंसूर अहमद से पूछ कर जवाब देने का यत्न करूंगा।]

आप ज़कात कैल्क्युलेटर का पन्ना नीचे स्क्रॉल करें!

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[1] इस्लाम के पांच महत्वपूर्ण स्तम्भ - 

  1. श्रद्धा और खुदा के एक होने और पैगम्बर मुहम्मद के उनके अन्तिम पैगम्बर होने में विश्वास।

  2. नित्य नमाज़ की प्रणाली।

  3. गरीब और जरूरतमन्द लोगों को ज़कात या दान देने का नियम तथा उनके प्रति सहानुभूति।

  4. उपवास के माध्यम से आत्मशुद्धि।

  5. जो शरीर से सक्षम हैं, का मक्का की तीर्थ यात्रा।


[उक्त शब्द/अनुवाद मेरा है, अत: सम्भव है कि कहीं कहीं इस्लाम के मूल आशय के साथ पूरा मेल न खाता हो।]


Thursday, August 2, 2012

शिवकुटी का मेला

[caption id="attachment_5965" align="alignleft" width="300"] आलू-दम का खोमचा सवेरे सवेरे लग गया था।[/caption]

शिवकुटी का मेला श्रावण शुक्ला अष्टमी को होता है। इस साल यह २६ जुलाई को था।

श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी धरयो शरीर - अर्थात तुलसी जयन्ती के अगले दिन।  तुलसी जयन्ती से इस मेले का कोई लेना देना नहीं लगता। शायद कोटेश्वर महादेव मन्दिर मे शिवलिंग के पीछे विराजमान देवी जी से लेना देना हो, जिनके लिये अष्टमी को यह मेला बनाया गया हो। पर अष्टमी को सवेरे देखा तो मन्दिर पर अखण्ड रामचरितमानस पाठ चलरहा था, जो पिछले दिन प्रारम्भ हुआ था और जिसका समापन नजदीक था। एक ओर यह मानस पाठ चल रहा था, दूसरी ओर मेला पर दुकान लगाने वाले तैय्यारी कर रहे थे।

आलू दम का खोमचा लगाने वाला सवेरे ही तैनात हो गया था। आलू निश्चय ही कल उबाले रहे होंगे। बरसात के सेलन भरे मौसम में अगर गरमी और उमस बढ़ी तो देर शाम तक यह आलू दम खाने लायक नहीं बचेगा। पर यह भी तय है कि खोमचे वाला अपना समान जरूर से पूरा बेच पाने में सफल होगा। भीड़ मेले में इतनी होती है कि – रज होई जाई पसान पोआरे (पत्थर फेंको तो भीड़ में रेत बन जाये)। उस भीड़ में सब बिक जायेगा।

शिवकुटी का मेला - सन २००८ की पुरानी पोस्ट। 


एक दुकानदार जमीन पर किताबें और चित्र सजा रहा था। मेंहदी उकेरने की चित्र वाली किताबे भी थी उनमें। औरतें वह खरीदती हैं, जरूर पर मेंहदी लगवाती किसी अनुभवी उकेरने वाली से हैं। ये किताबें सिर्फ उनकी कल्पना को पोषित करते होंगे।

एक नानखटाई, मिठाई, अनरसा, सोनपापड़ी, घेवर वाले की दुकान – ठेला जम गया था सवेरे सवेरे। कड़ाही गरमाने की तैय्यारी हो रही थी। यह दुकान अच्छी बिक्री करने वाली है – शर्तिया!

[caption id="attachment_5971" align="aligncenter" width="800"] मिठाई, अनरसा, नानखटाई की दुकान।[/caption]

खिलौने, चश्मा, बांसुरी, गुब्बारा वाला अपना सामान एक डण्डे पर लटका चुका था। सस्ता सामान। वे माता पिता, जो पैसा कम खर्च कर काम चलाना चाहेंगे, बच्चों को इसी दुकान के सामान से बहलायेंगे। एक अन्य दुकानदार इसी तरह का सामान तिरपाल लगा कर उसके नीचे सजा रहा था।

नगरपालिका के कर्मचारी थे जो चूने की लकीर बिछा रहे थे। नगरपालिका, पुलीस, बिजली और पानी वाले अपनी ड्यूटी मुस्तैदी से करते हैं। एक बारगी तो लगता है कि वास्तव में बहुत कर्मठ लोग हैं ये जो मेला को सफल बनाने के लिये हाड़ तोड़ मेहनत करते हैं। पर थोड़ा तह में जायें तो पायेंगे कि मेला भी उन्हे भरपूर देता है।

एक चाट बेचने वाली दुकान के आदमी और बिजली वाले के बीच यह संवाद सुनें:

केतना लाइट हईं (कितनी लाइट हैं?)


अब तीन लिख लें। (सात आठ सी.एफ.एल. आप गिन ही सकते हैं।)


(मन्द आवाज में) देख्यअ, पईसा और केहू के जिनि देह्यअ। (देखना पैसा किसी और को मत दे देना। अर्थात यह बिजली कर्मी पैसा खुद लेना चाहता है। ... हर आदमी मेला से कमाई झटकने को आतुर!)


सवेरे मैने मेले की तैय्यारी भर देखी। शाम ओ दफ्तर से आने में देर हो गयी (रास्ते में ट्रेफिक जाम लगा था)। अत: भीड़ भाड़ वाला मेला नहीं देख पाया। घर पर ही एक दुकान से मंगाई आलू टिक्की खाने को मिल गयी। अगले दिन सवेरे जब घूमने के लिये निकले तो दुकानें सिमट गयी थीं। दोना-पत्तल चाटने सूअर घूम रहे थे। एक बड़े स्टेज (जो एक ट्रक पर था) बहुत से लोग सो रहे थे।

पर साढ़े नौ बजे दफ्तर जाते समय पाया तो करीब पच्चीस तीस सफाई कर्मी (अधिकांश स्त्रियां) सड़क साफ करने में लगे थे। शाम तक सब कुछ साफ सुथरा (यथावत) दिखा।

मेला अच्छे से सम्पन्न हो गया था![slideshow]

Monday, July 30, 2012

ममफोर्डगंज के अफसर

[caption id="attachment_5947" align="alignleft" width="300"] "ममफोर्डगंज का अफसर" का प्रशस्ति कहता संपेरा सांप को हाथ में लेने का निमन्त्रण देता हुआ।[/caption]

एक हाथ में मोबाइल, दूसरे हाथ में बेटन। जींस की पैण्ट। ऊपर कुरता। अधपके बाल। यह आदमी मैं ही था, जो पत्नीजी के साथ गंगा किनारे जा रहा था। श्रावण शुक्लपक्ष अष्टमी का दिन। इस दिन शिवकुटी में मेला लगता है। मेलहरू सवेरे से आने लगते हैं पर मेला गरमाता संझा को ही है।

मैं तो सवेरे स्नान करने वालों की रहचह लेने गंगा किनारे जा रहा था। सामान्य से ज्यादा भीड़ थी स्नानार्थियों की। पहले सांप ले कर संपेरे शिवकुटी घाट की सीढ़ियों पर या कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास बैठते थे। अब किसी नये चलन के अनुसार स्नान की जगह पर गंगा किनारे आने जाने के रास्ते में बैठे थे। कुल तीन थे वे।

उनमें से एक प्रगल्भ था - हमें देख जोर जोर से बोलने लगा - जय भोलेनाथ। जय नाग देवता! आपका भला करेंगे...

[caption id="attachment_5948" align="aligncenter" width="800"] जय भोलेनाथ। जय नाग देवता! आपका भला करेंगे...[/caption]

दूसरा, जो दूसरी ओर बैठा था, उतनी ही ऊंची आवाज में बोला - अरे हम जानते हैं, ये ममफोर्डगंज के अफसर हैं। दुहाई हो साहब।

मैं अफसर जैसा कत्तई नहीं लग रहा था। विशुद्ध शिवकुटी का देशज बाशिंदा हूं। अत: मुझे यह ममफोर्डगंज के अफसर की थ्योरी समझ नहीं आयी। हम आगे बढ़ गये। स्नान करते लोगों के भिन्न कोण से मैने दो-चार चित्र लिये। गंगाजी बहुत धीमे धीमे बढ़ रही हैं अपनी चौडाई में अत: स्नान करने वालों को पानी में पचास कदम चल कर जाना होता है, जहां उन्हे डुबकी लगाने लायक गहराई मिलती है। लोगों की एक कतार पानी में चलती भी दिख रही थी और उस पंक्ति के अन्त पर लोग स्नान करते नजर आ रहे थे। साल दर साल इस तरह के दृष्य देख रहा हूं। पर साल दर साल सम्मोहन बरकरार रहता है गंगाजी का, उनके प्रवाह का, उनके दांये बांये घूम जाने की अनप्रेडिक्टेबिलिटी का।

वापस लौटते समय मेरी पत्नीजी ने कहा कि दस पांच रुपये हों तो इन संपेरों को दे दिये जायें। मैने जब पैसे निकाले तो वे संपेरे सतर्क हो गये। मम्फोर्डगंज का अफसर बोलने वाले ने अपने दोनों पिटारे खोल दिये। एक में छोटा और दूसरे में बड़ा सांप था। बड़े वाले को उसने छेड़ा तो फन निकाल लिया उसने। संपेरे ने मेरी पत्नीजी को आमन्त्रण दिया कि उसको हाथ में ले कर देखें वे। हाथ में लेने के ऑफर को तुरत भयमिश्रित इनकार कर दिया पत्नीजी ने। पर उस सपेरे से प्रश्न जरूर पूछा - क्या खिलाते हो इस सांप को?

बेसन की गोली बना कर खिलाते हैं। बेसन और चावल की मिली गोलियां।  

दूध भी पिलाते हो? - यह पूछने पर आनाकानी तो किया उसने, पर स्वीकार किया कि सांप दूध नहीं पीता! या फिर सांप को वह दूध नहीं पिलाता।

[caption id="attachment_5949" align="aligncenter" width="800"] "बेसन की गोली बना कर खिलाते हैं (सांप को)। बेसन और चावल की मिली गोलियां।"[/caption]

वह फिर पैसा मिलने की आशा से प्रशस्ति गायन की ओर लौटा। अरे मेम साहब, (मुझे दिखा कर) आपको खूब पहचान रहे हैं। जंगल के अफसर हैं। ममफोर्डगंज के। मुझे अहसास हो गया कि कोई डी.एफ.ओ. साहब का दफ्तर या घर देखा होगा इसने ममफोर्डगंज में। उसी से मुझको को-रिलेट कर रहा है। उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया हमने। पर पत्नीजी ने उसे दस रुपये दे दिये।

दूसरी ओर एक छोटे बच्चे के साथ दूसरा सपेरा था। वह भी अपनी सांप की पिटारियां खोलने और सांपों को कोंचने लगा। जय हो! जय भोलेनाथ। यह बन्दा ज्यादा प्रगल्भ था, पर मेरी अफसरी को चम्पी करने की बजाय भोलेनाथ को इनवोक (invoke) कर रहा था। उसमें भी कोई खराबी नजर नहीं आयी मुझे। उसे भी दस रुपये दिये पत्नीजी ने।

[caption id="attachment_5950" align="aligncenter" width="800"] एक तीसरा, अपेक्षाकृत कमजोर मार्केटिंग तकनीक युक्त सपेरा भी बैठा था।[/caption]

एक तीसरा, अपेक्षाकृत कमजोर मार्केटिंग तकनीक युक्त सपेरा भी बैठा था। उसको देने के लिये हमारे पास पैसे नहीं बचे तो भोलेनाथ वाले को आधा पैसा उस तीसरे को देने की हिदायत दी। ... मुझे पूरा यकीन है कि उसमें से एक पाई वह तीसरे को नहीं देगा। पर हमारे संपेरा-अध्याय की यहीं इति हो गयी। घर के लिये लौट पड़े हम।

[caption id="attachment_5951" align="aligncenter" width="800"] लोगों की एक कतार पानी में चलती भी दिख रही थी और उस पंक्ति के अन्त पर लोग स्नान करते नजर आ रहे थे।[/caption]

Saturday, July 28, 2012

विकास हलवाई झूलेवाला

[caption id="attachment_5936" align="alignleft" width="300"] शिवकुटी लगे मेले में लगे झूले।[/caption]

कल था शिवकुटी का मेला। हर साल श्रावण मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी को होता है यह। एक दिन पहले से झूले वाले आ जाते हैं। नगरपालिका के लोग सड़क सफ़ाई, उनके किनारे चूना बिखेरना, सड़क पर रोशनी-पानी की व्यवस्था करना आदि करते हैं। पुलीस वाले अपना एक अस्थाई नियन्त्रण कक्ष बनाते हैं। दो साल पहले तक तो एक दो घोड़े पर सवार पुलीस वाले भी रहते थे। अब घोड़े नहीं दिखते। उनका स्थान मोटर साइकल या चौपहिया वाहन ने ले लिया होगा।

तरह तरह की दुकानें लगती हैं - चाट, अनरसा, नानखटाई, बरतन, आलूदम, खिलौने, शीशा-कंघी, सस्ती किताबें, मेंहदी, पिपिहरी, गुब्बारे --- सब मिलते हैं।

बच्चों के लिये आकर्षण होता है झूले का। गोल चकरी वाला बड़ा झूला लगता है। हवा भर कर फिसलपट्टी वाला उपकरण और स्विंग करने वाले झूले भी होते हैं। जिस दिन झूला बिठाया जा रहा होता है, उसी समय से आस पास के बच्चे इधर उधर चक्कर काटने लगते हैं। झूला लगते ही झूले वालों की बिक्री प्रारम्भ हो जाती है। रेट सबसे ज्यादा मेले के दिन होते हैं। उससे एक दिन पहले कम रेट पर और एक दो दिन बाद और कम रेट पर बच्चों को झुलाते हैं ये झूले वाले। फिर ट्रक आदि में उन्हे डिसमेण्टल कर लाद कर वैसे ही ले जाते हैं वे लोग, जैसे लाये थे।

आज शाम के समय झूला चल रहा था। काफी बच्चे थे। बिजली नहीं आ रही थी, अत: हवा इन्फ्लेट कर बनने वाली फिसलपट्टी नहीं चल रही थी।

एक नाव के आकार के स्विंग करते झूले में आठ दस बच्चे बैठे थे। पास में एक सांवला सा आदमी खड़ा था। मैने उससे पूछा - यह झूला आपका है?

वह एक कदम पीछे हट गया और पास ही में खड़े दूसरे व्यक्ति की ओर इशारा कर बोला - इनका है। 
[caption id="attachment_5924" align="aligncenter" width="300"] विकास हलवाई झूलावाला का झूला और पास में खड़ी उसकी मोटर साइकल।[/caption]
वह दूसरा व्यक्ति पान खा रहा था। पैण्ट कमीज पहने था। देखने में प्रसन्नमन लगा। वह बोला -  जी, मेरा है। एक यह झूला है और एक रबड़ वाली फिसलपट्टी। वह वहां है। अभी बिजली नहीं आ रही, इस लिये वह नहीं चल रही। 

आत्मविश्वास से भरा वह व्यक्ति बात करने में भी तेज था। ज्यादा सवाल पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। बताने लगा कि यहां से वे अपना सामान ले कर सलोरी जायेंगे। वहां से फलानी जगह और उसके बाद ढिमाकी जगह।

सामान कैसे ले जाते हैं?

परसों गाड़ी में लाद कर ले जायेंगे। 

कितनी दूर तक जाते हैं?

उसने बताया कि तेलियरगंज का रहने वाला है वह। इलाहाबाद से २५०-३०० किलोमीटर के दायरे में करीब तीस चालीस जगह जाते हैं वे साल भर में। एक मेले से दूसरे में। पूरा शिड्यूल तय होता है। गाजीपुर, कानपुर, फतेहपुर आदि अनेक उत्तरप्रदेश के शहरों के नाम गिना दिये उसने जहां वे जाते हैं। इन सभी जगहों से तो अब काफी पहचान हो गयी है। हर जगह पर कहां रुकना है, किस दुकान से आटा-चावल खरीदना है और कहां से सब्जी - सब तय है। उसके साथ बारह कर्मचारी हैं जो साल भर एक जगह से दूसरी जाते रहते हैं।

मुझे लगा कि मैं आधुनिक घुमन्तू जाति के जीव - आधुनिक गाडुलिये लुहार से मिल रहा हूं - जिनका व्यवसाय, बोलचाल, पहनावा अलग है और जो अधिक आत्मविश्वास से भरे हैं।

आपका नाम क्या है?

उसने बताया - विकास हलवाई। तेलियरगंज में उसकी हलवाई की दुकान है। उसके अलावा एक चाट कॉर्नर भी है। दुकान, चाट कॉर्नर और झूले के व्यवसाय के अलावा वह केटरिंग का ठेका भी लेता है शादी-व्याह-समारोहों में।

फिर विकास हलवाई को लगा कि मैं उसे हल्के से न ले लूं - मैं आपसे मिलूंगा तो ऐसे ही कपड़ों में, भले ही घर पर फ्रिज टीवी और सुख सुविधा का सभी सामान है। चलने के लिये भी बहत्तर हजार की पल्सर है मेरे पास। 
[caption id="attachment_5925" align="aligncenter" width="300"] विकास हलवाई झूलावाला।[/caption]
बारह कर्मचारी, हलवाई, केटरिंग और झूले का व्यवसाय। आत्मविश्वास से लबालब बातचीत। विकास हलवाई को हल्के से लेने का कोई कारण नहीं था। मैने आत्मीयता से उसके कन्धे पर हाथ रखा और कहा कि उससे मिल कर वहुत प्रसन्नता हुई हमें। मेरी पत्नीजी ने भी अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।

हमने चलते हुये परस्पर नमस्ते की। मैने विकास से हाथ मिलाया। उसके हाथ मिलाने में उसके आत्मविश्वास का पर्याप्त आभास होता था। एक संकोच में भरे छोटे कामकाजी का हाथ नहीं था वह, नये भारत के सेल्फ-कॉन्फीडेंस से लबालब नयी पीढ़ी के उद्यमशील व्यवसायी का हाथ था!

अच्छा लगा विकास हलवाई झूलेवाला से हाथ मिलाना और वह छोटी मुलाकात। आप भी कभी विकास से मिलियेगा तो उसे हल्के से लेने की गलती न करियेगा। ... वह नये भारत की तस्वीर है। स्मार्ट और स्ट्रीट स्मार्ट भी।