Showing posts with label पर्यावरण. Show all posts
Showing posts with label पर्यावरण. Show all posts

Monday, August 12, 2013

कचरा उठता नहीं!

सन 1985 में जब मैने रेलवे की नौकरी में पहली पोस्टिंग रतलाम में ज्वाइन की थी तो वहां मण्डल रेल प्रबन्धक कार्यलय के पास दो-बत्ती इलके में सवेरे 25-30 सफाई कर्मी झाडू लगा कर पानी का छिडकाव किया करते थे। कालांतर में यह व्यवस्था बन्द हो गयी। लगभग 15 साल वहां (दो चरणों में) रहने के बाद जब 2003 में वहां से निकला तो सड़के पहले की अपेक्षा बहुत अधिक धूल भरी और कचरा युक्त हो चुकी थीं।

[caption id="attachment_7078" align="alignright" width="300"]सफाई कर्मी न होने पर सूअर हाथ बटाते हैं! सफाई कर्मी न होने पर सूअर हाथ बटाते हैं![/caption]

कमोबेश हर शहर का यह हाल है। सफाई कर्मियों की संख्या बढ़ी नहीं है। प्रति सफाई कर्मी जितनी सड़क साफ होनी चाहिये, वह नहीं होती और मशीनों का प्रयोग - मशीनों पर बहुत खर्चा करने के बावजूद - नहीं होता। कारण यह है कि हमारी सड़कें और फुटपाथ उन मशीनों के प्रयोग के लिये सही तरह डिजाइण्ड नहीं हैं।

कचरा पहले की अपेक्षा दुगना-तिगुना हो गया है और उसका उतना कलेक्शन ही नहीं होता। इसलिये काफी कचरा शहर की गलियों-सड़कों पर बिखरा दिखता है।

इलाहाबाद में कुम्भ मेले के समय सड़कें सुधरी थीं और साफ सफाई हुई थी। पर हालात बहुत तेजी से सामान्य होते गये हैं। मेन रोड ही टूटने लगी हैं वर्षा से और कचरा इधर उधर बिखरा नजर आता है।

[caption id="attachment_7079" align="aligncenter" width="584"]शिवकुटी मन्दिर की सड़क के किनारे का हाल। आज सावन के मेले का इंतजाम होने जा रहा है यहाँ! शिवकुटी मन्दिर की सड़क के किनारे का हाल। आज सावन के मेले का इंतजाम होने जा रहा है यहाँ![/caption]

द बक स्टॉप्स एट रिपन बिल्डिंग नामक शीर्षक से( सन 1913 में बनी रिपन बिल्डिंग में चेन्ने कार्पोरेशन का कार्यालय है)  आज द हिन्दू में एक लेख है, जिसमें चेन्ने की सफाई व्यवस्था के बारे में लिखा है। इस लेख में बताया गया है -

[caption id="attachment_7082" align="aligncenter" width="300"]द हिन्दू के ओरीजनल आर्टीकल में चित्र द हिन्दू के ओरीजनल आर्टीकल में चित्र[/caption]

  1. सन 1991 में चेन्ने में दो डम्प यार्ड थे। आज भी उतने ही हैं।

  2. 19300 सफाई कर्मी हैं। उनमें से 6900 रोज सड़कें साफ करते हैं। प्रति कर्मी 500 मीटर सड़क साफ होनी चाहिये। पर काम करने वालों में अधिकांश अधेड़ महिलायें हैं। उनसे उतना काम होता ही नहीं।

  3. प्रति कर्मी औसत 250 किलो कचरा उठना चाहिये पर कार्यकुशलता इस टार्गेट की आधी ही है।

  4. शहर में 12 मेकेनिकल सड़क सफाई करने वाले यंत्र हैं। ये चार किलोमीटर प्रतिघण्टा सड़क साफ कर सकते हैं। पर उनका प्रयोग सही नहीं हो पाता। सड़कें ठीक से डिजाइन नहीं हैं!

  5. करीब 5200 व्यक्ति ट्राईसाइकल से घर घर कचरा उठाते हैं। पर शहर के लोग कहते हैं कि यह व्यवस्था अपर्याप्त है।


मेरे ख्याल से चेन्ने की व्यवस्था कई उत्तरभारतीय शहरों से कहीं बेहतर होगी। पर जब वहां यह असंतोषजनक है तो अन्य जगहों की व्यवस्था तो भगवान भरोसे!

Monday, July 29, 2013

मन्दाकिनी नदी पर रोप-वे : अपडेट

शैलेश पाण्डेय ने मंदाकिनी नदी पर फाटा-रेलगांव के पास उत्तराखण्ड की त्रासदी के बाद एक रोप-वे का निर्माण किया था। उस समय यह मेक-शिफ्ट तरीके से बन पाया था। यद्यपि उसपर व्यक्ति आ जा सकते थे, पर एहतियाद के लिये उसका प्रयोग मात्र रिलीफ का सामान नदी पार कराने के लिये किया गया। या जुलाई के प्रारम्भ की बात है।

[caption id="attachment_7051" align="alignright" width="300"]फाटा के पास मन्दाकिनी पर शैलेश की टीम की माल ढुलाई के लिये बनाई रोप वे। फाटा के पास मन्दाकिनी पर शैलेश की टीम की माल ढुलाई के लिये बनाई रोप वे।[/caption]

वापस आने पर शैलेश और उनके मित्र स्थानीय प्रशासन, लोक सेवकों और सांसदों के सम्पर्क में रहे जिससे इस रोप वे की पुख्ता ग्राउटिंग के साथ इसका व्यापक ढुलाई में प्रयोग हो सके। बीच में वर्षा और खराब मौसम से कई बार हताशा की दशा आयी। कई बार स्थानीय प्रशासन की ढुलमुल दशा को कोसने का मन भी बना। पर अन्तत: स्थानीय लोगों के अपने इनीशियेटिव से दशा बदली और उसपर ७०-८० किलो का सामान एक फेरी में लाया ले जाने लगा।

अब आज मुझे बताया गया कि उस रोप वे से आदमी भी मान्दाकिनी के आर-पार जाने लगे हैं। आज तक डेढ़ सौ से अधिक लोग नदी पार कर चुके हैं रोप वे से।

यूं कहा जाये कि रोप वे Fully Functional हो गया है!

शैलेश, हर्ष और आलोक को बहुत बधाई!

इस विषय में शैलेश पाण्डेय का फ़ेसबुक पर अपडेट यहां पर है! वहां आप कुछ् और चित्र देख पायेंगे रोप-वे के। एक चित्र में तो एक महिला बैठ रही है रोप वे की ट्राली में, नदी पार करने के लिये!

[caption id="attachment_7067" align="aligncenter" width="584"]मंदाकिनी के रोप वे से नदी पार करते स्थानीय ग्रामीण। मंदाकिनी के रोप वे से नदी पार करते स्थानीय ग्रामीण।[/caption]

Thursday, July 4, 2013

मन्दाकिनी नदी पर रोप-वे बनाने में सफल रही शैलेश की टीम

उनतीस जून को फाटा और रेलगांव को जोड़ने के लिये शैलेश और हर्ष ने योजना बनाई थी रोप वे बनाने के लिये। जब उन्होने मुझे बताया था इसके बारे में तो मुझे लगा था कि रोप वे बनाने में लगभग दस दिन तो लगेंगे ही। पहले इस प्रॉजेक्ट की फ़ण्डिन्ग की समस्या होगी। फिर सामान लाने की। तकनीकी सहयोग की दरकार अलग। पर आज तीन जुलाई है - विचार आने के बाद चौथा दिन।

और आज वह रोप वे बन कर तैयार है।

[caption id="attachment_7051" align="aligncenter" width="584"]फाटा के पास मन्दाकिनी पर शैलेश की टीम की माल ढुलाई के लिये बनाई रोप वे। फाटा के पास मन्दाकिनी पर शैलेश की टीम की माल ढुलाई के लिये बनाई रोप वे।[/caption]

सरकार को यह काम करना होता तो अभी इस पर बैठक हो रही होती या तहसील स्तर से जरूरत की एक चिठ्ठी भेजी गयी होती जिला मुख्यालय को। जल्दी से जल्दी भी बन कर यह तैयार होता १५ अगस्त के आसपास - और तब स्थानीय एमएलए या डीएम साहब इसका फ़ीता काट उद्घाटन करते।  तब तक रेलगांव क्षेत्र के १०-१५ गांव रो-पीट कर अपनी हालत से समझौता कर चुके होते।

मैं इस योजना के क्रियान्वयन और उसकी स्पीड से बहुत प्रभावित हूं और मेरे मन में शैलेश, हर्ष तथा आलोक भट्ट के बारे में अहोभाव पनपा और पुख्ता हुआ है। आशा है भविष्य में इन सज्जनों से और अधिक इण्टरेक्शन होगा - सोशल मीडिया पर और आमने सामने भी।

शैलेश ने दोपहर १:४० पर मुझे यह चित्र भेजा था ह्वाट्स-एप्प पर।

[caption id="attachment_7052" align="aligncenter" width="584"]लोग एक पेड़ से तार बांध रहे हैं रोप वे बनाने के लिये लोग एक पेड़ से तार बांध रहे हैं रोप वे बनाने के लिये[/caption]

इस चित्र में है कि लोग एक पेड़ से तार बांध रहे हैं रोप वे बनाने के लिये। लगभग ढ़ाई बजे नदी एक ओर तार बांधा जा चुका था। दूसरी ओर चेन-पुली न होने के कारण तार को लोगों द्वारा हाथ से खींच कर बांधना था। वह काम भी शैलेश एण्ड कम्पनी ने ही किया। [स्थानीय लोग अपने तरीके से ऊंचाई से उतर कर मन्दाकिनी पर एक लकडी का पुल बना सामान ढोने में व्यस्त थे। वह काफ़ी श्रमसाध्य काम है और लकड़ी के पुल की जिन्दगी भी मन्दाकिनी के पानी बढ़ने पर समाप्त होने की पर्याप्त आशंका है।] सम्भवत: उन्हे यह समाधान ऑफ-बीट लग रहा था। एक बार वे इस रोप वे पर सरलता से अधिक सामान बिना श्रम आते जाते देखेंगे तो इसकी उपयोगिता स्पष्ट होगी उन्हे।

[caption id="attachment_7053" align="aligncenter" width="584"]क्या फ़ाइव-स्टार लन्च है! शैलेश और साथी शाम चार बजे भोजन करते हुये। क्या फ़ाइव-स्टार लन्च है! शैलेश और साथी शाम चार बजे भोजन करते हुये।[/caption]

काम करते लोगों ने देर से ही भोजन किया होगा - लगभग शाम सवा चार बजे शैलेश ने चित्र भेजा जिसमें जमीन पर बैठे वे भोजन कर रहे हैं - क्या फ़ाइव-स्टार लन्च है! बहुत कम को ही यह वातावरण और यह भोजन नसीब होता होगा!

मैं दफ़्तर से शाम साढ़े सात बजे निकल रहा था, तब शैलेश का यह चित्र मिला जिससे यह स्पष्ट हुआ कि रोप वे कमीशन हो गया है। सांझ की रोशनी दिख रही है इसमें। नदी की धारा के बीचोंबीच सामान जाता दिख रहा है रोप वे के जरीये। शैलेश ने बताया कि इसमें लगभग ४० किलो वजन था। यद्यपि एक बार में तार की मजबूती के आधार पर लगभग २ क्विण्टल सामान ले जाया जा सकेगा रोप वे पर।

[caption id="attachment_7054" align="aligncenter" width="584"]रोप वे कमीशण्ड हो गया है। पहला पे-लोड भेजने को तैयार। वजन लगभग ४० किलो। रोप वे कमीशण्ड हो गया है। पहला पे-लोड भेजने को तैयार। वजन लगभग ४० किलो।[/caption]

पहली बार एक फ़ेरा सामान पंहुचाने में लगभग १० मिनट लगे। शैलेश का कहना है कि यह समय आगे रोप वे के उपयोग में रवां होने के साथ आधा हो जायेगा।

शैलेश का कहना है कि कल से यह रोप वे ग्रामीणों को उपयोग के लिये सौप दिया जायेगा - जिस तरह से भी वे उपयोग करना चाहें। इसको ले कर उनकी बहुत स्पून-फीडिन्ग नहीं की जायेगी।

[caption id="attachment_7055" align="aligncenter" width="584"]रोप वे से जाते सामान का एक अन्य दृष्य। रोप वे से जाते सामान का एक अन्य दृष्य।[/caption]

यह रोप वे ग्रेविटी रोप वे नहीं है। तार लगभग धरती के समान्तर बांधा गया है। पर जैसा आप देख सकते हैं, पुली और तार के माध्यम से बहुत हल्के खींचने से ही सामान नदी पार कर सकता है। बल और समय - दोनो की बचत और नदी के उफान में होने पर भी यह काम करता रहेगा।

इतने त्वरित रूप से रोप वे बनने की अपेक्ष मुझे नहीं थी। इलाहाबाद में बैठे मैं थ्रिल महसूस कर रहा हूं। आप भी कर रहे हैं न?

[caption id="attachment_7056" align="aligncenter" width="584"]शैलेश और उनकी रोप वे के निर्माण में लगी टीम। शैलेश और उनकी रोप वे के निर्माण में लगी टीम।[/caption]

Thursday, June 27, 2013

शैलेश का उत्तराखण्ड के लिये प्रस्थान

अगर इस देश की आत्मा है; तो उसका स्पन्दन महसूस करने वाले लोग शैलेश पाण्डेय जैसे होंगे!




[caption id="attachment_6995" align="aligncenter" width="448"]इलाहाबाद स्टेशन पर शैलेश पाण्डेय इलाहाबाद स्टेशन पर शैलेश पाण्डेय[/caption]

कल दोपहर में मैं इलाहाबाद रेलवे स्टेशन गया। शैलेश पाण्डेय ने कहा था कि वे उत्तराखण्ड जा रहे हैं, सो उनसे मिलने की इच्छा थी।

25 जून को शाम संगम एक्प्रेस पकड़ने का कार्यक्रम था उनका। मैने अपने दफ्तर का काम समेटा और इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पंहुच गया उनसे मिलने। फोन पर पता किया तो वे बाजार में उत्तराखण्ड के प्रवास के दौरान काम आने वाली रिलीफ सामग्री खरीद रहे थे। मुझे स्टेशन मैनेजर साहब के कमरे में इंतजार करना था लगभग आधा घण्टा। वहां बैठे मैं पाल थरू की पुस्तक "घोस्ट ट्रेन टू द ईस्टर्न स्टार" के पन्ने पलट रहा था, जिसमें ओरहान पामुक को ऐसा व्यक्ति बताया गया था, जो "इस्ताम्बूल" की आत्मा पहचानता है। उसी समय मुझे विचार आया था शैलेश के बारे में, जो मैने ऊपर लिखा है।

शैलेश घुमक्कड़ हैं - लगभग पूरा भारत घूम चुके हैं - अधिकांश अपनी मोटर साइकल पर। एक समाज सेवी संस्था चलाते हैं वाराणसी में। फौज से ऐक्षिक सेवानिवृति लिये हैं और जुनून रखते हैं सोच और काम में। आप उनके ट्विटर प्रोफाइल [ @shaileshkpandey ] से उनके बारे में ज्यादा जान सकते हैं। उनकी यात्राओं और उनके कार्य के बारे में जानकारी उनके ब्लॉग से भी मिल सकेगी।

लगभग आधे घण्टे बाद शैलेश मिले। उनके साथ एक अन्य सहयोगी सरजू थे। दोनो के पास पिठ्ठू थे और दो गत्ते के डिब्बों में रिलीफ सामग्री। शैलेश धाराप्रवाह बोल सकते हैं - बशर्ते आप अच्छे श्रोता हों। वह मैं था। उन्होने बताना प्रारम्भ किया - भईया, ये जो पतलून और टीशर्ट पहन रखी है, महीना भर उसी में काम चलाना है। वही धो कर सुखा कर पहना जायेगा। एक गमछा है बैग में। और ज्यादा की जरूरत नहीं।

दूर दराज में बिजली नहीं होगी, सो एक सोलर चार्जर रखा है जो मोबाइल आदि चार्ज कर दिया करेगा। मुझे इण्टीरियर गांव में जाना है वहां। असल में तीर्थयात्री/पर्यटक की फिक्र करने वाले बहुत होंगे उत्तराखण्ड में। दूर दराज के गावों में जहां बहुत तबाही हुई है, वहां कोई खास सहायता नहीं मिली होगी।  मैं वहां जाऊंगा। यहां से मैं हरिद्वार जा रहा हूं। वहां से ऋषिकेश और आगे रुद्रप्रयाग में एक जगह है फोता। वहां पहुंचकर स्थानीय भाजपा के लोगों से भी सम्पर्क करूंगा। ... एक गांव में जा कर बच्चों को इकठ्ठा कर मेक-शिफ्ट स्कूल जैसा बनाने का विचार है। ... आपदा के समय सब से उपेक्षित बच्चे ही होते हैं!


एक महीना वहां व्यतीत करने का विचार है। उसकी तैयारी के साथ जा रहा हूं। कुछ लोगों ने सहायता देने और हरिद्वार में जुड़ने की बात कही है; पर मैं उसे बहुत पक्का मान कर नहीं चल रहा हूं। ये सरजू और मैं - हम दोनो की टीम है।


अपने साथ मैं इलेक्ट्रानिक रक्तचाप नापने वाला उपकरण ले जा रहा हूं। और साथ में कुछ दवायें हैं - मसलन डायरिया के उपचार के लिये, अस्थमा के लिये इनहेलर्स, वाटर प्यूरीफायर टेबलेट्स...


मेरे जैसे कुर्सी पर बैठे विचार ठेलने वाले को एक कर्म क्षेत्र के व्यक्ति से मिलना और सुनना बहुत अच्छा लग रहा था। शैलेश मुझसे 18-19 साल छोटे हैं। एक पीढ़ी छोटे। मेरी पीढ़ी ने तो देश लोढ़ दिया है। या तो बेच खाया है या अपने निकम्मे पन से पंगु कर दिया है। आशा है तो शैलेश जैसे लोगों से है।

मैने शैलेश को सहेजा है कि इस दौरान अपनी गतिविधियों से मुझे अवगत कराते रहें; जिसे मैं ब्लॉग पर प्रस्तुत कर सकूं। उन्होने इस विचार को अपनी स्वीकृति दे दी है। सो आगे आने वाले दिनों में इसकी सूचना मैं देता रहूंगा।

मैं शैलेश को स्टेशन पर छोड़ कर चला आया। उनकी ट्रेन लगभग एक घण्टा बाद चली। इस बीच सरजू को पता चला कि उत्तरप्रदेश सरकार से बंटने वाला लैपटॉप उसे 1 जुलाई को मिलेगा, तो उसकी यात्रा स्थगित हो गयी। अब सरजू शैलेश से 2 जुलाई को चल कर जुड़ेगा। शैलेश फिलहाल चल अकेला मोड में  चले इलाहाबाद से।

[caption id="attachment_6996" align="aligncenter" width="448"]शैलेश और सरजू शैलेश और सरजू[/caption]

Monday, April 22, 2013

आउ, आउ; जल्दी आउ!

वह सामान्यत: अपने सब्जी के खेत में काम करता दीखता है गंगाजी के किनारे। मेहनती है। उसी को सबसे पहले काम में लगते देखता हूं।

दशमी के दिन वह खेत में काम करने के बजाय पानी में हिल कर खड़ा था। पैण्ट उतार कर, मात्र नेकर और कमीज पहने। नदी की धारा में कुछ नारियल, पॉलीथीन की पन्नियों में पूजा सामग्री और फूल बह कर जा रहे थे। उसने उनके आने की दिशा में अपने आप को पोजीशन कर रखा था।

लोग नवरात्रि के पश्चात पूजा में रखे नारियल और पूजा सामग्री दशमी के दिन सवेरे विसर्जित करते हैं गंगाजी में। वह वही विसर्जित नारियल पकड़ने के लिये उद्यम कर रहा था।

FotoSketcher - DSCN2656

एक नारियल उसने लपक कर पकड़ा। फिर उसे हिला-बजा कर देखा। नारियल की क्वालिटी से संतुष्ट लगा वह। कुछ देर बाद बहते पॉलीथीन के पैकेट को पकड़ा उसने। पन्नी खोल कर नारियल देखा। ठीक नहीं लगा वह। सो पन्नी में रख कर ही वापस नदी में उछाल दिया उसने।

नारियल विषयक पुरानी पोस्टें -


हीरालाल की नारियल साधना


पकल्ले बे, नरियर



मै करीब सौ कदम दूर खड़ा था उससे - गंगा तट पर। जोर से चिल्ला कर पूछा  - हाथ लगा नारियल?

हां, कह कर उसने हाथ ऊपर उठा कर नारियल दिखाया मुझे। फिर वह आती नदी की धारा में ध्यान केन्द्रित करने लगा। कुछ दूर दो नारियल बहते आ रहे थे। उसको अपनी बेताबी के मुकाबले बहाव धीमा लगा नदी का।

जैसे हाथ हिला हिला कर किसी को बुलाया जाता है; वैसा ही वह धारा की दिशा में हाथ हिला कर कहने लगा - आउ, आउ; जल्दी आउ! (आओ, आओ, जल्दी आओ!)

सवेरे का आनन्ददायक समय, गंगा की धारा और नारियल का मुफ्त में हाथ लगने वाला खजाना - सब मिल कर उस तीस पैंतीस साल के आदमी में बचपना उभार रहे थे। मैं भी बहती धारा की चाल निहारता सोच रहा था कि जरा जल्दी ही पंहुचें नारियल उस व्यक्ति तक!

आउ, आउ; जल्दी आउ! (आओ, आओ, जल्दी आओ!)


जल्दी आओ नारियल!

Friday, April 19, 2013

फोड़ (हार्ड कोक) के साइकल व्यवसायी

मैं जब भी बोकारो जाता हूं तो मुझे फोड़ (खनन का कोयला जला कर उससे बने फोड़ - हार्ड कोक) को ले कर चलते साइकल वाले बहुत आकर्षित करते हैं। कोयले का अवैध खनन; उसके बाद उसे खुले में जला कर फोड़ बनाना और फोड़ को ले कर बोकारो के पास तक ले कर आना एक व्यवसायिक चेन है। मुझे यह भी बताया गया कि बोकारो में यह चेन और आगे बढ़ती है। यहां इस हार्ड कोक को खरीद कर अन्य साइकल वाले उसे ले कर बंगाल तक जाते हैं।

फोड़ के फुटकर व्यवसाय पर पुरानी पोस्ट है - फोड़ का फुटकर व्यापार


मैं बोकारो में स्टील प्लाण्ट की ओर जा रहा था। रास्ते में ये साइकल व्यवसायी दिखे तो वाहन रुकवा कर एक से मैने बात की। मेरे साथ बोकारो के यातायात निरीक्षक श्री गोस्वामी और वहां के एरिया मैनेजर श्री कुलदीप तिवारी थे। कुलदीप तो वहां हाल ही में पदस्थ हुये थे, पर गोस्वामी ड़ेढ़ दो दशक से वहां हैं। उन्हे इन लोगों को पर्याप्त देखा है।

[caption id="attachment_6842" align="aligncenter" width="584"]फोड़ का व्यवसायी  और यातायात करने वाला - बालूचन्द फोड़ का व्यवसायी और यातायात करने वाला - बालूचन्द[/caption]

वे एक के पीछे एक चलने वाले दो साइकल सवार थे। मेरे अनुमान से उनमें से प्रत्येक के पास लगभग तीन क्विण्टल कोयला था। साइकल के दोनो ओर, बीच में और पीछे लादा हुआ। लगभग इतना कोयला, जिससे ज्यादा लाद कर चल पाना शायद सम्भव न हो। चित्र मैने दोनो के लिये पर बातचीत आगे चलने वाले साइकल व्यवसायी से की।

उसने बताया कि वह धनबाद क्षेत्र के जारीडिह से यह हार्ड कोक/फोड़ ले कर चले हैं। उसके पास लगभग तीन क्विण्टल कोयला है। वे आगे नया मोड़ तक जा रहे हैं बेचने के लिये। तीन क्विण्टल फोड़ उसने चार सौ रुपये में खरीदा है। इसे जब नया मोड़ पर वह बेचेगा, तब तक उसका लगभग 100 रुपया और खर्च होगा। बेचने पर उसे करीब 1200 रुपये प्राप्त होंगे। इस तरह दो दिन की मेहनत पर उसे सात सौ रुपये मिलेंगे। साढ़े तीन सौ रुपये प्रतिदिन।

मैं उसके लिये व्यवसायी शब्द का इस्तेमाल इसी लिये कर रहा हूं। वह मुझे 350 रुपये प्रतिदिन की आमदनी का अर्थशात्र बड़ी सूक्ष्मता से बता गया। फिर वह मात्र श्रम का इनपुट नहीं कर रहा था इस चेन में। वह (माल - फोड़) खरीद और बेचने का व्यवसाय करने वाला था। वह शारीरिक खतरा ले कर उत्खनन के काम में नहीं लगा था, वरन ट्रांसपोर्टेशन और उससे जुड़े पुलीसिया भ्रष्टाचार को डील कर कोयले के फुटकर व्यवसाय को एक अंजाम तक पंहुचा रहा था। मैने उसका नाम पूछा - उसने बताया - बालू चन्द।

फोड़ के फुटकर व्यवसाय पर मैं पहले भी इस ब्लॉग पर लिख चुका हूं। पर इस बार बालू चन्द से बात चीत में स्थिति मुझे और स्पष्ट हुई।

पिछली पोस्ट (15 मई 2009) में मैने यह लिखा था - 


कत्रासगढ़ के पास कोयला खदान से अवैध कोयला उठाते हैं ये लोग। सीसीएल के स्टाफ को कार्ड पर कोयला घरेलू प्रयोग के लिये मिलता है। कुछ उसका अंश होता है। इसके अलावा कुछ कोयला सिक्यूरिटी फोर्स वाले को दूसरी तरफ झांकने का शुल्क अदाकर अवैध खनन से निकाला जाता है। निकालने के बाद यह कोयला खुले में जला कर उसका धुआं करने का तत्व निकाला जाता है। उसके बाद बचने वाले “फोड़” को बेचने निकलते हैं ये लोग। निकालने/फोड़ बनाने वाले ही रातोंरात कत्रास से चास/बोकारो (३३-३४ किलोमीटर) तक साइकल पर ढो कर लाते हैं। एक साइकल के माल पर ४००-५०० रुपया कमाते होंगे ये बन्दे। उसमें से पुलीस का भी हिस्सा होता होगा।


बोकारो के रेलवे के यातायात निरिक्षक श्री गोस्वामी ने बताया कि कोयला अवैध उत्खनन करने वाले और उसे जला कर फोड़ बनाने वाले अधिकांशत: एक ही व्यक्ति होते हैं। उन्हे अपने रिस्क के लिये सवा सौ/ड़ेढ सौ रुपया प्रति क्विण्टल मिलता है। उसके बाद इसे कोयला आढ़तियों तक पंहुचाने वाले बालूचन्द जैसे दो सौ, सवा दो सौ रुपया प्रति क्विण्टल पाते हैं। बालू चन्द जैसे व्यवसायियों को स्थानीय भाषा में क्या कहा जाता है? मैने यह कई लोगों से पूछा, पर मुझे कोई सम्बोधन उनके लिये नहीं बता पाया कोई। उन्हे कुछ तो कहा ही जाता होगा!

मेरी बिटिया के वाहन ड्राइवर श्री किशोर ने इस चेन के तीसरे घटक की बात बतायी। नया मोड़/ बालीडीह से कोयला ढ़ोने वाले एक और साइकल व्यवसायी यह हार्ड कोक उठाते हैं और उसे ले कर पश्चिम बंगाल जाते हैं। बोकारो से पुरुलिया (पश्चिम बंगाल) अढ़सठ किलो मीटर है। वे तीन-चार दिन में अपना सफर पूरा करते होंगे। मैं अभी इस तीसरी स्तर के व्यवसायी से मिल नहीं पाया हूं। पर धनबाद - बोकारो की आगे आने वाली ट्रिप्स में उस प्रकार के व्यक्ति से भी कभी सामना होगा, जरूर। या शायद नया-मोड़/बालीडीह पर तहकीकात करनी चाहिये उसके लिये।

[caption id="attachment_6857" align="aligncenter" width="584"]जारीडीह से पुरुलिया का रास्ता - 95 किलोमीटर जारीडीह से पुरुलिया का रास्ता - 95 किलोमीटर[/caption]

हां, यह तब कर पाऊंगा, जब कि मेरे मन में जिज्ञासा बरकरार रहे और मैं इस ब्लॉग को यह सब पोस्ट करने के लिये जीवित रखे रखूं।

जरूरी यह है कि, अनुभव जो भी हों, उन्हे लिख डाला जाये!

[श्री गोस्वामी ने मुझे बताया कि लौह अयस्क को भी इसी तरह अवैध खनन और वहन करने वाले व्यवसायी होते हैं। वे निश्चय ही इतना अधिक/तीन क्विण्टल अयस्क ले कर नहीं चलते होंगे। पर वे कहां से कहां तक जाते हैं, इसके बारे में आगे कभी पता करूंगा।]

[caption id="attachment_6843" align="aligncenter" width="584"]फोड़ का दूसरा व्यवसायी फोड़ का दूसरा व्यवसायी[/caption]

Saturday, March 30, 2013

भोंदू

[caption id="" align="alignnone" width="599"]image भोन्दू, पास में बैठ कर बतियाने लगा।[/caption]

भोंदू अकेला नहीं था। एक समूह था - तीन आदमी और तीन औरतें। चुनार स्टेशन पर सिंगरौली जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। औरतें जमीन पर गठ्ठर लिए बैठी थीं। एक आदमी बांस की पतली डंडी लिए बेंच पर बैठा था। डंडी के ऊपर एक छोटी गुल्ली जैसी डंडी बाँध रखी थी। यानी वह एक लग्गी थी।

आदमी ने अपना नाम बताया - रामलोचन। उसके पास दूसरा खड़ा था। वह था भोंदू। भोंदू, नाम के अनुरूप नहीं था। वाचाल था। अधिकतर प्रश्नों के उत्तर उसी ने दिए।

वे लोग सिंगरौली जा रहे थे। वहां जंगल में पत्ते इकठ्ठे कर वापस आयेंगे। पत्ते यहाँ बेचने का काम करते हैं।

कितना मिल जाता है?

रामलोचन ने चुनौटी खुरचते हुए हेहे करते बताया - करीब सौ रूपया प्रति व्यक्ति। हमें लगा कि लगभग यही लेबर रेट तो गाँव में होगा। पर रामलोचन की घुमावदार बातों से यह स्पष्ट हुआ कि लोकल काम में पेमेंट आसानी से नहीं मिलता। देने वाले बहुत आज कल कराते हैं।

भोंदू ने अपने काम के खतरे बताने चालू किये। वह हमारे पास आ कर जमीन पर बैठ गया और बोला कि वहां जंगल में बहुत शेर, भालू हैं। उनके डर के बावजूद हम वहां जा कर पत्ते लाते हैं।

अच्छा, शेर देखे वहां? काफी नुकीले सवाल पर उसने बैकट्रेक किया - भालू तो आये दिन नजर आते हैं।

इतने में उस समूह का तीसरा आदमी सामने आया। वह सबसे ज्यादा सजाधजा था। उसके पास दो लग्गियाँ थीं। नाम बताया- दसमी। दसमी ने ज्यादा बातचीत नहीं की। वह संभवत कौतूहल वश आगे आया था और अपनी फोटो खिंचाना चाहता था।

[caption id="" align="alignnone" width="600"]image कॉलम १ - ऊपर रामलोचन चुनौटी खरोंचते। नेपथ्य में गोल की महिलायें। नीचे भोन्दू। कॉलम २ - रामलोचन लग्गी लिये। कॉलम ३ - ऊपर दसमी और नीचे भोन्दू।[/caption]

सिंगरौली की गाड़ी आ गयी थी। औरते अपने गठ्ठर उठाने लगीं। वे और आदमी जल्दी से ट्रेन की और बढ़ने लगे। भोंदू फिर भी पास बैठा रहा। उसे मालूम था कि गाड़ी खड़ी रहेगी कुछ देर।

टिकट लेते हो?

भोंदू ने स्पष्ट किया कि नहीं। टीटीई ने आज तक तंग नहीं किया। पुलीस वाले कभी कभी उगाही कर लेते हैं।

कितना लेते हैं? उसने बताया - यही कोइ दस बीस रूपए।

मेरा ब्लॉग रेलवे वाले नहीं पढ़ते। वाणिज्य विभाग वाले तो कतई नहीं। :-D पुलीस वाले भी नहीं पढ़ते होंगे। अच्छा है। :)

रेलवे कितनी समाज सेवा करती है। उसके इस योगदान को आंकड़ो में बताया जा सकता है? या क्या भोंदू और उसके गोल के लोग उसे रिकोग्नाइज करते हैं? नहीं। मेरे ख्याल से कदापि नहीं।

पर मुझे भोंदू और उसकी गोल के लोग बहुत आकर्षक लगे। उनसे फिर मिलाना चाहूँगा।

Thursday, March 21, 2013

खरपतवार का सौन्दर्य

_conv_Sanjay24_0

आज सवेरे गंगा किनारे बादल थे। मनोरम दृष्य। हवा मंद बह रही थी। नावें किनारे लगी थी। मांझी नैया गंगा किनारे।

पर आज को छोड़ कर पिछले एक महीने से गंगाजी के कछार में सवेरे मौसम खुला रहता था। कोहरे का नामोनिशान नहीं। क्षितिज पर न बादल और न धुंध।

सूर्योदय आजकल साफ और चटक दिखता है। सवेरे की रोशनी में वनस्पति, पक्षी और लोग तम्बई चमक से सुन्दर लगते हैं। जैसे जैसे सूरज आसमान में ऊपर उठाते हैं, तम्बई रंग सोने के रंग में बदलने लगता है। यह सारा खेल आधा पौना घंटे का होता है।

_conv_March191_0इस समय सभी वनस्पति- चाहे वह कछार की बोई सब्जियाँ हों, या रेत में बेतरतीब उग आये खतपतवार, सभी अत्यन्त सुंदर प्रतीत होते हैं।

पहले मैं सब्जियों के चित्र लेने में रूचि लेता था। सब्जियाँ, मडई, क्यारी सींचते कर्मी, पानी और खाद देने के उपक्रम आदि को ध्यान से देखता था। उनपर अनेक पोस्टें हैं ब्लॉग पर।

मेरे पास उपयुक्त कैमरा नहीं था, खरपतवार का सौन्दर्य चित्र में लेने के लिए। केवल सात मेगापिक्सल का कैमरा था। अब16 मेगापिक्सल वाला हो जाने से चित्र लगता है कुछ बेहतर आते हैं। अत: खरपतवार के चित्र लेने का प्रयास करने लगा हूँ।

इसमे से कुछ चित्र ओस की बूंदों को झलकाते पौधों के भी हैं। पौधों की पत्तियों पर लगे मकड़ी के जालों पर जमा ओस की बूंदों का अपना अलग प्रकार का सौन्दर्य है!

आप चित्र देखें। मोबाइल से चित्र अपलोड करने में झंझट रहा। जो अन्तत: "लैपटॉप शरणम् गच्छ" से ठीक हुआ!
wpid-conv_Sanjay43.jpg
[slideshow]

Saturday, February 9, 2013

बिसखोपड़ा

[caption id="attachment_6640" align="alignright" width="225"]बिसखोपड़ा पकड़ने वाला सपेरा - अछैबर! बिसखोपड़ा पकड़ने वाला सपेरा - अछैबर![/caption]

शिवकुटी जैसी गँहरी (गँवई + शहरी) बस्ती में घुस आया तो वह बिसखोपड़ा था। नहीं तो सुसंस्कृत विषखोपड़ा होता या फिर अपने किसी अंग्रेजी या बायोलॉजिकल नाम से जाना जाता।

मेरी पत्नीजी वाशिंग मशीन से कपड़े धो रही थीं तो परनाले की पाइप से एक पूंछ सा कुछ हिलता देखा उन्होने। सोचा कि सांप आ गया है। उसकी पूंछ को चिमटे से पकड़ कर खींचने का प्रयास किया गया तो लगा कि कोई पतला जीव नहीं है। मोटा सांप होगा या अजगर का बच्चा। वह पाइप में अपनी पूंछ सिकोड़ आगे निकलने का प्रयास कर रहा था - मानव अतिक्रमण से बचने के लिये।

बड़े सांप/अजगर के कल्पना कर घर के भृत्य ऋषि कुमार को दौड़ाया गया गड़रिया के पुरवा। मोतीलाल इन्जीनियरिंग कॉलेज के पास रेलवे फाटक पर है गांव गड़रिया का पुरवा। वहां संपेरों के सात आठ घर हैं। पता चला कि सारे संपेरे अपने जीव-जन्तु ले कर कुम्भ मेला क्षेत्र में गये हैं जीविका कमाने। एक बूढ़ा और बीमार अछैबर भर है। उसी को ले कर आया गया।

उसके सामने परनाले का पाइप तोड़ा गया। पाइप में चिपका दिखा बिसखोपड़ा। लगभग डेढ़ हाथ लम्बा। पाइप से चिपका हुआ था। बिसखोपड़ा की मुण्डी पकड़ कर काबू करने में अछैबर को मुश्किल से कुछ सेकेण्ड लगे होंगे। उसके बाद ड्रामा शुरू हुआ।

[caption id="attachment_6636" align="aligncenter" width="500"]अछैबर द्वारा पकड़ा गया डेढ़ हांथ लम्बा विषखोपड़ा। अछैबर द्वारा पकड़ा गया डेढ़ हांथ लम्बा विषखोपड़ा।[/caption]

सपेरे ने जीव के खतरनाक होने का विवरण बुनना प्रारम्भ किया। ’बड़ा जहरीला होता है। लपक कर काटता है। काटा आदमी लहर भी नहीं देता। समझो कि जान पर खेल कर पकड़ा है मैने। मेहनताने में इग्यारह सौ से कम नहीं लूंगा। धरो इग्यारह सौ तो मन्तर फूंक कर बोरा में काबू करूं इसे’।

आस पड़ोस वाले भी देखने के लिये आ गये थे। अमन की माई ने अकेले में कहा कि ये दो ढाई सौ से कम में मानेगा नहीं। गब्बर की माई ने निरीक्षण कर स्वीकार किया कि बहुत खतरनाक है ये बिसखोपड़ा। मेरे पिताजी ने कहा कि पैसा क्या देना। गांव में तो ऐसे ही पकड़ते हैं। इसे एक अंजुरी चावल दे दो।

अछैबर ने चावल लेने का प्रोपोजल तो समरी ली रिजेक्ट कर दिया। बिसखोपड़े की खूंखारियत का पुन: वर्णन किया। बार्गेनिंग में (पड़ोस के यादव जी की सलाह पर) उसे इग्यारह सौ की बजाय पचास रुपये दिये गये, जो उसने अस्वीकार कर दिये। अन्तत: उसे सौ रुपये दिये गये तो अछैबर संतुष्ट भया। फिर वह बोला - अच्छा, ऊ चऊरवा भी दई दिया जाये! (अच्छा, वह चावल भी दे दिया जाये)।

सौ रुपये और लगभग तीन पाव चावल पर वह बिसखोपड़ा पकडाया। अछैबर ने कहा कि बिसखोपड़ा को वह छोड़ देगा। पता नहीं क्या करेगा? या उसको भी मेला क्षेत्र में दिखा कर पैसा कमायेगा? एक बोरी में पकड़ कर ले गया वह बिसखोपड़े को। बोरी और रस्सी भी हमारी ले गया अछैबर।

सौ रुपये और तीन पाव चावल में हमें विषखोपड़ा का चित्र मिल गया। उसपर एक वाटरमार्क लगा दिया जाये?!

Sunday, December 9, 2012

टेंगर

[टेंगर, और यह कि सोंइस (मीठे जल की डॉल्फिन) रोज दिखती है यहां।]

[caption id="attachment_6519" align="alignright" width="300"]लल्लन, बायें और राकेश खड़ा हुआ, दायें। लल्लन, बायें और राकेश खड़ा हुआ, दायें।[/caption]

एक नाव पर वे दो थे - बाद में पता चला नाम था लल्लन और राकेश। लल्लन के हाथ में पतवार थी और राकेश जाल डाल रहा था गंगा नदी में।

हम - मैं और मेरी पत्नीजी - गंगा किनारे खड़े देख रहे थे उनकी गतिविधियां। उनकी नाव कभी बीच धारा में चली जाती और कभी किनारे आने लगती। इस पार पानी काफी उथला था, सो पूरी तरह किनारे पर नहीं आती थी। नाव के कुछ चित्र भी लिये मैने। एक बार जब किनारे से लगभग बीत पच्चीस गज की दूरी पर होगी, मैने उनसे बात करने की गर्ज से चिल्ला कर कहा - कितनी मिल रही हैं मछलियां?

उनमें से जवान, जो मछलियां पकड़ रहा था, ने कहा - मिल रही हैं। फिर बातचीत होने लगी। वे सवेरे आठ बजे से यह काम कर रहे थे और दोपहर दो बजे तक करेंगे। लगभग तीन किलो भर मिल जायेंगी मछलियां उन्हे।

मैने पूछा हमे उस पार तक नाव में ले चलोगे? सहर्ष वे तैयार हो गये। लगभग आधा पौना घण्टा हम नाव पर रहेंगे। सौ रुपये में। वे नाव किनारे ले आये। हम दोनों नाव में सवार हो गये। कुछ ही पल में नाव धारा में थी।

[caption id="attachment_6520" align="aligncenter" width="500"]पतवार चलाता लल्लन। पतवार चलाता लल्लन।[/caption]

लल्लन अधेड़ था। नाव की पतवार चला रहा था। आस पास उपलब्ध सामग्री से लगता था खैनी भी खा रहा था। बहुत कम बोलने वाला। बड़ी मुश्किल से नाम बताया अपना। उसको यह भी अच्छा नहीं लग रहा था कि नाव में हम अपनी चप्पलें पहने बैठ गये थे और उससे कुछ कीचड़ लग गयी थी। हमने अपनी चप्पलें उतार दीं। मैने चप्पल उल्टी कर रख दी, जिससे उसका कीचड़ वाला पेंदा सूख जाये। ... लल्लन का पतवार चलाना बहुत सहज और प्रयास हीन था। चूंकि वह बहुत बोल नहीं रहा था, इस लिये मैने प्रशंसा नहीं की। अन्यथा बात चलाने के लिये कहता - आप नाव बहुत दक्षता से खे रहे हैं।

हमारे प्रश्नों के उत्तर राकेश ने दिये। पच्चीस-तीस की उम्र का सांवला नौजवान। वह समझ गया कि हममें नदी, मछली पकड़ने और उन लोगों की जिन्दगी के बारे में कौतूहल है। अत: उसके उत्तर विस्तृत थे और अपनी ओर से भी जानकारी हमें देने का प्रयास किया राकेश ने।

[caption id="attachment_6521" align="aligncenter" width="500"]डांड हाथ में लिये राकेश। डांड हाथ में लिये राकेश।[/caption]

वे साल में हर मौसम में, हर दिन मछली पकड़ने का काम करते हैं। गंगा नदी उन्हे हर दिन मछलियां देती हैं। मैने जोर दे कर पूछा कि वर्षा के महीनों में भी पकड़ते हैं? राकेश ने बताया - हां।

मेरे मन में था कि मछलियों के प्रजनन का कोई समय होता होगा और उन महीनों में शायद मछेरे छोड़ देते हों मछलियां पकड़ना। पर राकेश की बात से लगा कि ऐसा कुछ भी न था। उसने बताया कि रोज तीन चार किलो मछली पकड़ लेते हैं वे और अस्सी से सौ रुपये किलो तक बिक जाती है। मछली पकड़ने के अलावा वे सब्जियां बोने का भी काम करते हैं कछार में। पर मुझे लगा कि शायद राकेश के परिवार के अन्य लोग सब्जियां बोते हों, वह मछली पकड़ने के काम में ही रहता है।

यहीं घर है? पूछने पर राकेश ने बताया कि वह रसूलाबाद का है और इसी क्षेत्र में मछली पकड़ता है। मैने जानना चाहा कि कभी नाव पर चलना हो तो उससे सम्पर्क करने के लिये कोई फोन है? इस पर राकेश ने कहा कि उसके पास तो नहीं है। घर में है जिसे उसकी बहन लोग इस्तेमाल करते हैं। नम्बर उसे नहीं मालुम था, सो बता नहीं पाया। यही कहा कि हम यहीं रहते हैं, जब चाहेंगे मिल जायेंगे!

उसने मुझे जाल नदी में डाल कर दिखाया - लगभग पचास मीटर लम्बा। वह डाल रहा था कि एक मछली फंस कर पानी के बाहर उछली। आप फोटो लीजिये - राकेश बोला। एक बार उछलने को कैमरे में नहीं समेटा जा सकता था। एक मछली और फंसी। लगभग आठ दस मिनट में जब वापस जाल उसने समेटा तो दो मछलियां जाल में थीं। एक लगभग एक फुट की थी और दूसरी उससे थोड़ी बड़ी।

यह टेंगर है। और पहले जो मैने पकड़ रखी है, वो चेल्हा हैं। दोनो टेंगर नाव पर पड़ी तड़फ रहीं थीं। इस समय हमें नदी की मछेरा-गाथा जानने का कौतूहल जकड़े था, सो मछलियों के प्रति करुणा का भाव हम पर हावी न हो पाया। मैं निस्पृह भाव से टेंगर का मुंह खोलना, बन्द करना और उसके शरीर का ऐंठना देखता रहा।

[caption id="attachment_6524" align="aligncenter" width="500"]टेंगर टेंगर[/caption]

इस तरफ कभी सोंइस दिखीं?

हां बहुत दिखती हैं। राकेश का यह बताना हमारे लिये बड़ी जानकारी थी। मैने पूछा, कितनी बार दिखी? महीने में दिख जाती है? कहां दिखी?

यहीं आसपास दिखती है। पैंतीस चालीस किलो की। लगभग रोज ही दिख जाती है।

मुझे लगा कि कहीं गलत न समझ रहा हो, पर जो भी विवरण उसने दिया, वह सोंइस (मीठे पानी की डॉल्फिन) का ही था। सोंइस विलुप्तप्राय जीव है। उसका शिकार नहीं होना चाहिये। राकेश के कहने से लगा भी नहीं कि वह कभी सोंइस पकड़ता हो। पर मैने साफ साफ तहकीकात भी नहीं की। अगली बार मिला तो पूछूंगा कि कोई सोंइस पकड़ता तो नहीं है।

खैर, सौ रुपये में गंगा जी का नौका भ्रमण और यह जानकारी की सोंइस है, और प्राय रोज दिखती है, बड़ी उपलब्धि थी।


किनारे से लगता था कि गंगाजी का पानी कम हो रहा है। पर जब उनकी चौड़ाई पार की तो अहसास हुआ कि गंगाजी पानी के मटमैला होने और बीच बीच में कहीं कहीं उथली हो जाने के बावजूद एक बड़ी नदी हैं। इतनी बड़ीं कि सुन्दर भी हो, गहराई का भय भी हो और श्रद्धा भी। राकेश जब जाल नहीं डाल रहा था, तब डांड चला रहा था। उसकी डांड़ के डूबने से अन्दाज लगता था गंगाजी की गहराई का। एक दो जगह वे पर्याप्त गहरी थीं। एक जगह इतनी उथली थीं कि एक मछेरा पैदल चलते जाल डाल रहा था।

कई अन्य मछेरे भी जाल डाल रहे थे। राकेश से पूछने पर कि आपस में कोई झगड़ा नहीं होता जाल डालने को ले कर; वह हंसा। हंसी से लगा कि यहां नदी सब को पर्याप्त दे रही हैं - हर मछेरे को पर्याप्त मछली है और हर मछली को पर्याप्त भोजन।

गंगा नदी को आदमी अपने कुकर्मों से भले ही मार रहा हो, वे अभी भी सब को मुक्त भाव से जीविका लुटा रही हैं।

एक छोटी सी नाव, जो इस समय लगभग पंद्रह हजार में बन जाती है (राकेश नें बताया कि साखू की लकड़ी की तो मंहगी होगी - तीस हजार की; पर सफेदा या आम की लकड़ी की पंद्रह हजार में बन जाती है और पांच साल अच्छे से चलती है) और एक जाल की बदौलत साल के बारहों महीने की आजीविका बेरोक टोक! और कहां मिलेगी?!

हमें किनारे उतारा राकेश ने। मैने उससे हाथ मिलाया और एक बार फिर उसकी नाव का चित्र लिया कैमरे में। एक बार फिर नाव पर पड़ी टेंगर तड़फी-उछली!

कुछ ही समय की मेहमान टेंगर। तुम्हारी आत्मा को शान्ति मिले टेंगर। भगवान अगला जन्म किसी बेहतर योनि में दें तुम्हें और गंगाजी का सानिध्य किसी और प्रकार से मिले तुम्हे।

[slideshow]

Saturday, November 3, 2012

उसमें जिन्दा है मछली अभी भी

नवम्बर २’२०१२

वे तीन थे। एक अधेड़। तहमद पहने और उसे पानी से बचाने के लिये आधा उलटे हुये। ऊपर पूरी बांह का स्वेटर पहने। एक जवान – कमीज-पतलून में। एक किशोर होता बच्चा – वह भी कमीज पतलून पहने था। दोनो ने पतलून पानी से बचने ऊपर चढ़ा रखी थी। उनके पास एक नाव थी; जिसमें नदी से पकड़ी चेल्हुआ मछलियां रख चुके थे। जब मैं वहां पंहुचा तो वे मछलियां पकड़ने के लिये बांधी गयी चारखाने वाले कपड़े की चादर समेटने का काम कर रहे थे। मैने देखा – चारखाने का कपड़ा नया था। शायद इसी सीजन में खरीदा होगा उन्होने और मछली पकड़ने के ही काम आ रहा होगा अभी। बाद में उसकी अच्छी लुंगिंया बन सकेंगी।



उनमें से जो जवान था, वह कुछ मुखर लग रहा था। बच्चे से बोला – देख हम लोगों की फोटो खिंच रही है। पर बच्चा और अधेड़ अपने काम को खत्म करने में ज्यादा रुचि ले रहे थे। काम तो फुर्ती से यह जवान भी कर रहा था। पर मुझसे बात भी करता जा रहा था।

वे बांस या लकड़ी को गंगा की रेती से उखाड़ कर उसके सहारे ताने हुये चारखाने के कपड़े को समेट रहे थे। लड़का लकड़ियां समेट कर नाव में रखने आ-जा रहा था। बची खुची मछलियां लुचकने को आस पास कौव्वे कांव कांव करते इधर उधर फुदक रहे थे। नाव में लदे ढेर को देख कर अन्दाज लग रहा था कि अच्छी खासी संख्या में मछलियां मिली होंगी इन लोगों को।



जवान ने मुझे बताया कि कल रात आठ बजे उन लोगों ने पानी रोकने का काम किया था। रात में पानी बढ़ने के साथ साथ मछलियां भी काफी आ गयी थीं। तड़के उन्होने अपना काम समेट लिया और अब रवाना हो जायेंगे। करीब “दो करेट” मछली है नाव में। अभी जिन्दा हैं। वह इस अन्दाज में बोला कि मैं शायद उन्हे देखने की उत्सुकता जताऊं। पर नाव तक पानी में हिल कर जाना और तड़फती मछलियां देखना मुझे अप्रिय कृत्य लगा। उसकी बजाय बात करना और फोटो खींचना बेहतर काम था।



दो करेट माने कितना किलो होगी मछली? मेरे पूछने का कोई संतोषजनक जवाब न दे पाया वह। उसने अधेड़ से पूछा, पर अधेड़ के पास भी कोई अनुमान न था। उसने बस यही कहा कि मछलियां काफी हैं (अन्दाज से बताया कि बित्ता भर से ज्यादा बडी भी हैं) और यहां स्थानीय बाजार में नहीं जाने वाली – बाहर जायेंगी।

मैं अपनी जिज्ञासा को और आयाम नहीं दे सका। जिन्दा तड़फती मछली के बारे में सोचना प्रिय नहीं लगता मुझे! जाने कितनी दूर अप-स्ट्रीम में उनका बीज पड़ा होगा। कितनी लम्बी यात्रा उन्होने की होगी गंगा नदी में। आज के बाद उनका शरीर जाने कितनी यात्रा कर कहां तक पंहुचेगा और कहां वे उदरस्थ होंगी? यह सब मेरे इस ब्लॉग पोस्ट का विषय नहीं है। मुझे तो इतना ही बताया है जवान ने कि नाव पर मछलियां जिंदा हैं अभी भी!

Thursday, October 4, 2012

माधव सदाशिव गोलवलकर और वर्गीज़ कुरियन

[caption id="attachment_6221" align="alignright" width="195"] 'I Too Had a Dream' by Verghese Kurien[/caption]

वर्गीज़ कुरियन की पुस्तक – ’आई टू हैड अ ड्रीम’ में एक प्रसंग माधव सदाशिवराव गोलवलकर ’गुरुजी” के बारे में है। ये दोनों उस समिति में थे जो सरकार ने गौ वध निषेध के बारे में सन् १९६७ में बनाई थी। इस समिति ने बारह साल व्यतीत किये। अन्त में मोरारजी देसाई के प्रधानमन्त्रित्व के दौरान यह बिना किसी रिपोर्ट बनाये/पेश किये भंग भी हो गयी।

मैं श्री कुरियन के शब्द उठाता हूं उनकी किताब से -

~~~~~~


पर एक आकस्मिक और विचित्र सी बात हुई हमारी नियमित बैठकों में। गोलवलकर और मैं बड़े गहरे मित्र बन गये। लोगों को यह देख कर घोर आश्चर्य होता था कि जब भी गोलवलकर कमरे में मुझे आते देखते थे, वे तेजी से उठ कर मुझे बाहों में भर लेते थे। …


गोलवलकर छोटे कद के थे। बमुश्किल पांच फीट। पर जब वे गुस्सा हो जाते थे तो उनकी आंखें आग बरसाती थीं। जिस बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया वह थी उनका अत्यन्त देशभक्त भारतीय होना। आप यह कह सकते हैं कि वे अपनी ब्राण्ड का राष्ट्रवाद फैला रहे थे और वह  भी गलत तरीके से, पर आप उनकी निष्ठा पर कभी शक नहीं कर सकते थे। एक दिन जब उन्होने पूरे जोश और भावना के साथ बैठक में गौ वध का विरोध किया था, वे मेरे पास आये और बोले – कुरियन, मैं तुम्हें बताऊं कि मैं गौ वध को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना रहा हूं?


मैने कहा, हां आप कृपया बतायें। क्यों कि, अन्यथा आप बहुत बुद्धिमान व्यक्ति हैं। आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?




[caption id="attachment_6220" align="alignleft" width="258"] माधव सदाशिवराव गोलवलकर ’गुरुजी’[/caption]

"मैने गौ वध निषेध पर अपना आवेदन असल में सरकार को परेशानी में डालने के लिये किया था।’ उन्होने मुझे अकेले में बताना शुरू किया। "मैने निश्चय किया कि मैं दस लाख लोगों के हस्ताक्षर एकत्रित कर राष्ट्रपति जी को ज्ञापन दूंगा। इस सन्दर्भ में मैने देश भर में यात्रायें की; यह जानने के लिये कि हस्ताक्षर इकठ्ठे करने का काम कैसे चल रहा है। इस काम में मैं उत्तर प्रदेश के एक गांव में गया। वहां मैने देखा कि एक महिला ने अपने पति को भोजन करा कर काम पर जाने के लिये विदा किया और अपने दो बच्चों को स्कूल के लिये भेज कर तपती दुपहरी में घर घर हस्ताक्षर इकठ्ठा करने चल दी। मुझे जिज्ञासा हुई कि यह महिला इस काम में इतना श्रम क्यों कर रही है? वह बहुत जुनूनी महिला नहीं थी। मैने सोचा तब भान हुआ कि यह वह अपनी गाय के लिये कर रही थी – जो उसकी रोजी-रोटी थी। तब मुझे समझ आया कि गाय में लोगों को संगठित करने की कितनी शक्ति है।"


"देखो, हमारे देश का क्या हाल हो गया है। जो विदेशी है, वह अच्छा है। जो देशी है वह बुरा। कौन अच्छा भारतीय है? वह जो कोट-पतलून पहनता है और हैट लगाता है। कौन बेकार भारतीय है? वह जो धोती पहनता है। वह देश जो अपने होने में गर्व नहीं महसूस करता और दूसरों की नकल करता है, वह कैसे कुछ बन सकता है? तब मुझे लगा कि गाय में देश को एक सूत्र में बांधने की ताकत है। वह भारत की संस्कृति का प्रतीक है। इस लिये कुरियन इस समिति में तुम मेरी गौ वध विरोध की बात का समर्थन करो तो भारत पांच साल में संगठित हो सकता है। … मैं जो कहना चाहता हूं, वह यह है कि गौ वध निषेध की बात कर मैं मूर्ख नहीं हूं, और न ही मैं धर्मोन्मादी हूं। मै  ठण्डे मन से यह कह रहा हूं – मैं गाय का उपयोग अपने लोगों की भारतीयता जगाने में करना चाहता हूं। इस लिये इस काम में मेरी सहायता करो।"


खैर, मैने गोलवलकर की इस बात से न तो सहमति जताई और न उस समिति में उनका समर्थन किया। पर मुझे यह पक्का यकीन हो गया कि वे अपने तरीके से लोगों में भारतीयता और भारत के प्रति गर्व जगाना चाह रहे थे। उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष ने मुझे बहुत प्रभावित किया। ये वह गोलवलकर थे, जिन्हे मैने जाना। लोगों ने उन्हे महात्मा गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने वाला कहा, पर मैं इस में कभी यकीन नहीं कर पाया। मुझे वे हमेशा एक ईमानदार और स्पष्टवक्ता लगे और मुझे यह हमेशा लगता रहा कि अगर वे एक कट्टरवादी हिन्दू धर्मोन्मादी होते तो वे कभी मेरे मित्र नहीं बन सकते थे।


अपनी जिन्दगी के अन्तिम दिनों में, जब वे बीमार थे और पूना में थे, तो उन्होने देश भर से राष्ट्रीय स्वयम् सेवक संघ के राज्य प्रमुखों को पूना बुलाया। वे जानते थे कि वे जाने वाले हैं। जब उनका देहावसान हो गया तब कुछ दिनों बाद मेरे दफ्तर में उनमें से एक सज्जन मुझसे मिलने आये। "श्रीमान् मैं गुजरात का आरएसएस प्रमुख हूं", उन्होने अपना परिचय देते हुये कहा – "आप जानते होंगे कि गुरुजी अब नहीं रहे। उन्होने हम सब को पूना बुलाया था। जब मैने बताया कि मैं गुजरात से हूं तो उन्होने मुझसे कहा कि “वापस जा कर आणद जाना और मेरी ओर से कुरियन को विशेष रूप से मेरा आशीर्वाद कहना।” मैं आपको गुरुजी का संदेश देने आया हूं।"


मैं पूरी तरह अभिभूत हो गया। उन्हे धन्यवाद दिया और सोच रहा था कि वे सज्जन चले जायेंगे। पर वे रुके और कहने लगे – "सर, आप ईसाई हैं। पर गुजरात में सभी लोगों में से केवल आपको ही अपना आशीर्वाद क्यों भेजा होगा गुरुजी ने?"


मैने उनसे कहा कि आपने यह गुरुजी से क्यों नहीं पूछा? मैं उन्हे कोई उत्तर न दे सका, क्यों कि मेरे पास कोई उत्तर था ही नहीं!







श्री कुरियन की पुस्तक का यह अंश मुझे बाध्य कर गया कि मैं अपनी (जैसी तैसी) हिन्दी में उसका अनुवाद प्रस्तुत करूं। यह अंश गोलवलकर जी के बारे में जो नेगेटिव नजरिया कथित सेकुलर लोग प्रचारित करते हैं, उसकी असलियत दिखलाता है।

उस पुस्तक में अनेक अंश हैं, जिनके बारे में मैंने पुस्तक पढ़ने के दौरान लिखना या अनुवाद करना चाहा। पर वह करने की ऊर्जा नहीं है मुझमें। शायद हिन्दी ब्लॉगिंग का प्रारम्भिक दौर होता और मैं पर्याप्त सक्रिय होता तो एक दो पोस्टें और लिखता। फिलहाल यही अनुंशंसा करूंगा कि आप यह पुस्तक पढें।

मेरा अपना मत है कि साठ-सत्तर के दशक में भारतीय समाज को गाय के मुद्दे पर एक सूत्र में बांधा जा सकता था। अब वह स्थिति नहीं है। अब गाय या गंगा लोगों को उद्वेलित नहीं करते।

[कुरियन गौ वध निषेध के पक्षधर नहीं थे। वे यह मानते थे कि अक्षम गायों को हटाना जरूरी है, जिससे (पहले से ही कम) संसाधनों का उपयोग स्वस्थ और उत्पादक पशुओं के लिये हो सके; जो डेयरी उद्योग की सफलता के लिये अनिवार्य है। हां, वे उत्पादक गायों के वध निषेध के पक्ष में स्टेण्ड लेने को तैयार थे।]

Sunday, September 30, 2012

शहरी भैंसें

[caption id="attachment_6188" align="alignright" width="300"] इलाहाबाद के एक व्यस्त चौराहे पर टहलते पशु।[/caption]

मेरी ट्रेन कानपुर से छूटी है। पूर्वांचल की बोली में कहे तो कानपुर से खुली है। खिड़की के बाहर झांकता हूं तो एक चौड़ी गली में भैसों का झुण्ड बसेरा किये नजर आता है।

कानपुर ही नहीं पूर्वी उत्तरप्रदेश के सभी शहरों या यूं कहें कि भारत के सभी (?) शहरों में गायें-भैंसें निवसते हैं। शहर लोगों के निवास के लिये होते हैं, नगरपालिकायें लोगों पर कृपा कर वहां भैंसों और गायों को भी बसाती हैं। ऑपरेशन फ्लड में वे अपना जितना भी बन सकता है, योगदान करती है। वर्गीज़ कुरियन नहीं रहे; उनकी आत्मा को पता नहीं इससे आनन्द होता होगा या कष्ट?!

शहरों को दूध सप्लाई का इससे रद्दी कोई मॉडल नहीं हो सकता। यह उन दूधियों से हजार दर्जा अश्लील है – जो बालटा ट्रेनों के बाहर लटका कर शहरों को सवेरे एक दो घण्टा यात्रा कर आते हैं और दोपहर-शाम को अपने कस्बे-गांव लौटते हैं। वे दूधिये तो गांव के किसानों गाय भैंस पालने वालों से अच्छा-बुरा हर तरह का दूघ खरीदते हैं। ट्रेनों में कम्यूटर्स और लम्बी दूरी के यात्रियों के लिये न्यूसेंस होते हैं। पर फिर भी वे शहर की सिविक एमेनिटीज़ पर गाय-गोरू पाल कर पहले से ही चरमराती व्यवस्था पर बोझ नहीं करते।

[caption id="attachment_6186" align="aligncenter" width="584"] गली सड़कों पर पलती गायें-भैसें - यह दशा भारत के हर शहर में है।[/caption]

मैं अपने शहर इलाहाबाद को देखता हूं – लगभग हर सड़क-गली में भैंसें-गायें पली नजर आती हैं। उनको पालने वाले सड़क पर ही उन्हे रखते हैं। देखने में कम से कम भैंसें अच्छी नस्ल की लगती हैं। हरा चारा तो उन्हे नसीब नहीं होता, पर जब तक वे दूध देती हैं, उन्हे खाने को ठीक मिलता है। जब वे दूध देने वाली नहीं होती, तब वे छुट्टा छोड़ दी जाती हैं और जर्जर यातायात व्यवस्था के लिये और भी खतरनाक हो जाती हैं।

शहर में पशुपालन - एक लाख से ज्यादा की आबादी वाले शहर में व्यवसायिक रूप से ५ से अधिक  पशुपालने के लिये वेटनरी विभाग/नगरपालिका से पंजीकरण आवश्यक है। उसके लिये व्यक्ति के पास पर्याप्त जमीन और सुविधायें (भोजन, पानी, जल-मल निकासी, पशु डाक्टर इत्यादि) होनी चाहियें। यह पंजीकरण ३ वर्ष के लिये होता है और इसकी जांच के लिये जन स्वास्थ्य विभाग तथा नगरपालिका के अधिकारी समय समय पर आने चाहियें। ... ये नियम किसी पश्चिमी देश के नहीं, भारत के हैं! :lol:


आधा इलाहाबाद इस समय खुदा हुआ है सीवेज लाइन बिछाने के चक्कर में। आसन्न कुम्भ मेले के कारण सड़क निर्माण के काम चल रहे हैं, उनसे भी यातायात बाधित है। रही सही कसर ये महिषियां पूरी कर देती हैं। लगता है डेयरी को-ऑपरेटिव इतने सक्षम नहीं हैं कि शहरी दूध की जरूरतों को पूरा कर सकें। इसके अलावा लोगों में एक भ्रम है कि सामने दुहाया दूध मिलावट वाला नहीं होता। इस लिये (मेरा अपना अनुमान है कि) समय के साथ शहर में भैंसे-गायों की संख्या भी बढ़ी है और सड़कों पर उनके लिये अतिक्रमण भी।

मैं जितना वर्गीज़ कुरियन को पढ़ता हूं, उतना स्वीकारता जाता हूं कि दूध का उत्पादन और आपूर्ति गांवों के को-ऑपरेटिव्स का काम है। शहरी भैंसों का उसमें योगदान न केवल अकुशल व्यवस्था है, वरन् स्वास्थ्य के लिये हानिकारक भी।

[slideshow]

 

Thursday, August 16, 2012

मितावली स्टेशन के जीव

मितावली टुण्डला से अगला स्टेशन है दिल्ली की ओर। यद्यपि यहां से तीन दिशाओं में ट्रेने जाती हैं – दिल्ली, कानपुर और आगरा की ओर, पर तकनीकी रूप से इसे जंक्शन नहीं कहा जा सकता – आगरा की ओर यहां से केवल मालगाड़ियां जाती हैं। छोटा स्टेशन है यह – रेलवे की भाषा में रोड साइड।

कुल पौने तीन सौ टिकट बिकते हैं मितावली रेलवे स्टेशन में हर रोज। केवल सवारी गाड़ियां रुकती हैं। आस पास गांव दूर दूर दिखाई नहीं पड़ते। खेत हैं। ज्यादातर खेतों में धान जैसी चीज नहीं, चारा उगा दिखता है।

मैं पुशट्राली पर निरीक्षण करते हुये यहां पंहुचा। स्टेशन मास्टर साहब को लगता है पहले से खबर रही होगी – एक व्यक्ति हमारे पंहुचते ही कोका कोला छाप पेय की बोतलें ले आया। मेरे लिये शर्करा युक्त पेय उचित नहीं है। यह कहने पर भी दिये ग्लास में पेय आधा कर दो – उस व्यक्ति ने थोड़ा ही कम किया। मेहमाननवाजी स्वीकारनी ही पड़ी स्टेशन मास्टर साहब की।

कुछ ही समय हुआ है स्टेशन में सिगनलिंग प्रणाली में परिवर्तन हुये। पहले लीवर से चलने वाले सिगनल थे – जिन्हे लीवर मैन दोनो ओर बने कैबिनों पर स्टेशन मास्टर साहब के निर्देशानुसार खींच कर आने-जाने वाली गाड़ियों के लिये कांटा सेट करते और सिगनल देते थे। कुल मिला कर कम से कम तीन व्यक्ति इस काम में स्ंलग्न होते थे – स्टेशन मास्टर और दो लीवर/कैबिन मैन।

[caption id="attachment_6064" align="aligncenter" width="584"] मितावली स्टेशन का परित्यक्त केबिन। अब लीवर की प्रणाली का स्थान सॉलिड स्टेट इंटरलॉकिंग ने ले लिया है।[/caption]

अब लीवर हटा कर सारा काम सॉलिड स्टेट इण्टरलॉकिंग से होने लगा है। स्टेशन मास्टर साहब के पास एक कम्प्यूटर् लगा है, जिसके मॉनीटर पर पूरे स्टेशन का नक्शा है। उसी नक्शे पर क्लिक कर वे रूट सेट करने और सिगनल देने का काम करते हैं।

[caption id="attachment_6067" align="aligncenter" width="584"] सॉलिड स्टेट इण्टरलॉकिंग का मॉनीटर।[/caption]

स्टेशन मास्टर साहब हमारे सामने एक मॉनीटर से दूसरे (स्टेण्ड बाई) पर स्विच-ओवर करने का डिमॉन्स्ट्रेशन कर रहे थे तो माउस सरक कर गिर गया। कोल्ड ड्र्ंक लाने वाला जवान तुरत बोला – अरे कछुआ गिर गया नीचे।  

[caption id="attachment_6069" align="alignright" width="148"] शिवशंकर।[/caption]
वाह! बेकार ही इस उपकरण को माउस कहा जाता है। देसी भाषा में कछुआ बेहतर शब्द है और इसका आकार भी कछुये से ज्यादा मिलता जुलता है।

उस नौजवान का नाम पूछा मैने – शिवशंकर। यहां के किसी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी का लड़का है और रेलवे के कामकाज के बारे में अपने पिता से कम नहीं जानता होगा शिवशंकर! स्टेशन मास्टर साहब का नाम था सीपी शर्मा।

निरीक्षण कर चलते हुये मैने स्टेशन मास्टर साहब से पूछा – और कोई समस्या? मकान वगैरह तो ठीक हैं यहां पर?

कहां साहब यह तो जंगल है। दिन में भी चले आते हैं। कमरे के बाहर तो दिखते हैं ही; कमरे में भी चले आते हैं। परसों ही आ गया था…

मुझे किसी ने बताया था कि यहां जंगली सूअर हैं नीलगाय के अलावा। मैने सोचा मास्टर साहब शायद किसी चौपाया की बात कर रहे हैं। पूछा – कौन आ जाता है? उत्तर शिवशंकर ने दिया – जी, सांप और बिषखोपड़ा। कमरे में भी चले लाते हैं। घर रहने लायक नहीं हैं। इस कमरे में काम करना भी संभल कर रह कर हो सकता है।

[caption id="attachment_6065" align="aligncenter" width="584"] मितावली के प्लेटफार्म पर बकरियां चराता गड़रिया।[/caption]

सांप, बिषखोपड़ा और नीलगाय् तो यहां आते हुये मैने देखे थे। जंगली सूअर देखने में नहीं आये। मुझे बताया गया कि वे खरतनाक हैं। हिंसा पर उतर आयें तो आदमी को मार सकते हैं। … मितावली स्टेशन के जीव!

फिर भी मैने आस पास घूम कर देखा तो स्टेशन पर कुछ परिवार रहते पाये। एक खटिया पर कुछ स्त्रियां-लड़कियां बैठी कंधी-चोटी करती दीखीं। उनकी प्राइवेसी भंग न हो, मैं वापस आ कर स्टेशन से रवाना हो गया।

चलते हुये स्टेशन मास्टर साहब से हाथ मिलाना और शिवशंकर के कन्धे पर आत्मीयता से हाथ रखना नहीं भूला मैं![slideshow]


Monday, March 26, 2012

गुटखा - पानमसाला

[caption id="attachment_5703" align="alignright" width="225" caption="श्री योगेश्वर दत्त पाठक। हमारे वाणिज्य निरीक्षक।"][/caption]

हमारे मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक (माल यातायात) सुश्री गौरी सक्सेना के कमरे में मिले श्री योगेश्वर दत्त पाठक। श्री  पाठक उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय के वाणिज्य निरीक्षक हैं। उनके काम में पार्सल से होने वाली आय का विश्लेषण करना भी है।

श्री पाठक जागरूक प्रकार के इंसान हैं। अपने आस पास, रेलवे, खबरों आदि को देखते समझते रहते हैं। उन्होने बताया कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि पानमसाला बनाने वाली कम्पनियां उसे प्लास्टिक पाउच में नहीं बेच सकतीं। पानमसाला बनाने वाली कम्पनियां कानपुर में बहुत हैं। इस निर्णय से उनके व्यवसाय पर कस कर लात पड़ी। उन्हे अपने पाउच के डिजाइन बदलने में परिवर्तन करने में तीन महीने लगे। इन तीन महीनों में बाजार में गुटखा (या पानमसाला) की उपलब्धता कम हो जाने के कारण लोगों की गुटखा सेवन की प्रवृत्ति में अंतर आया। कई लोग गुटखा-पानमसाला से विमुख हो गये।

कानपुर से रेल पार्सल के रूप में बहुत सा गुटखा/पानमसाला बाहर जाता है। कानपुर की पार्सल आय लगभग एक करोड़ रुपये प्रतिमास हुआ करती थी, जो श्री पाठक के अनुसार अब पैंसठ लाख तक गिर गयी है। यह पानमसाला यातायात में भारी कमी होनेके कारण हुआ है। श्री पाठक ने बताया कि यह लोगों के पानमसाला सेवन की प्रवृत्ति में कमी के कारण भी हो सकता है। अब प्लास्टिक की बजाय पेपर के पाउच में बनने के कारण इसकी कीमत 1 रुपये से बढ़ कर दो रुपये हो गयी है। इसके अलावा पहले प्लास्टिक पाउच होने के कारण शेल्फ लाइफ आसानी से 6 महीने हुआ करती थी, पर अब पेपर पाउच में गुटखा डेढ़ महीने में ही खराब होने लगा है। निश्चय ही लोग गुटखा विमुख हुये हैं।

श्री पाठक ने बताया कि उत्तरप्रदेश में पिछली सरकार ने गुटखा पर उत्पादकर भी बहुत बढ़ा दिया था। अत: कुछ पानमसाला यूनिटें यहां से हट कर उत्तराखण्ड (या बेंगळूरु ?) चली गयी हैं।

[caption id="attachment_5704" align="aligncenter" width="584" caption="कोटेश्वर महादेव, शिवकुटी के प्रांगण में माला-फूल बेचने वाली मालिन। इनके पास गुटखा/पानमसाला के पाउच भी मिल जाते हैं। गुटखा भक्त सेवन करते हैं, शिव नहीं!"][/caption]

यह सूचना मिलने पर मैने कोटेश्वर महदेव मन्दिर के प्रांगण में फूल बेचने वाली महिला (जो सिगरेट-पानमसाला भी रखती है) से दो पाउच गुटखा खरीदा - राजश्री और आशिकी ब्राण्ड के। दोनो दो रुपये के थे। इनके पाउच पर मुख के केंसर का चित्र लगी चेतावनी भी थी। ये पाउच कागज के थे। आशिकी ब्राण्ड का पूर्णत: कागज था पर राजश्री ब्राण्ड के कागज पर एक चमकीली परत (शायद उसमें अल्यूमीनियम का अंश हो) थी।

[caption id="attachment_5705" align="alignleft" width="300" caption="मालिन जी से खरीदे दो रुपये वाले दो गुटखा पाउच।"][/caption]

मैने मालिन जी से पूछा गुटखा की बिक्री के बारे में। उन्होने बताया कि पिछले साल दो-तीन महीने तो ये पाउच आने बन्द हो गये थे। पर अब तो आ रहे हैं। लोग खरीदते भी है। उनके अनुसार बिक्री पिछले साल जैसी ही है - "सब खाते हैं, किसी को बीमारी की फिकर नहीं"!

खैर, मालिन का परसेप्शन अपनी जगह, पानमसाला यातायात कम जरूर हुआ है। दाम बढ़ने और पाउच की शेल्फ लाइफ कम होने से गुटखा कम्पनियों को लात अवश्य लगी है। दुकानों/गुमटियों पर जहां पानमसाला के लटकते पाउचों की लड़ियों के पीछे बैठा दुकानदार ठीक से दिखता नहीं था, अब उतनी लड़ियां नजर नहीं आती गुमटियों पर।

गुटखा नहीं खा रहे तो क्या खा रहे हैं लोग? सुश्री गौरी सक्सेना (जिन्होने हाल ही में चुनार तक की सड़क यात्रा की है) की मानें तो अब कस्बाई गुमटियों पर भी पाउच कम दीखे, उनमें सामने अंगूर रखे दिखे। अंगूर अब शहरी उच्च-मध्यम वर्ग की लग्जरी नहीं रहे - वे गांव-कस्बों तक  पंहुच गये हैं।

Sunday, February 12, 2012

बेंगळूरु - कांक्रीट और वृक्ष का मल्लयुद्ध

[caption id="attachment_5278" align="alignright" width="300" caption="यशवंतपुर स्टेशन के पास बनती बहुमंजिला इमारत। विशालकाय निर्माण उपकरण ऐसे लगता है मानो बंगलोर का झण्डा-निशान हो!"][/caption]

बेंगळूरु में मैने अनथक निर्माण प्रक्रिया के दर्शन किये। फ्लाईओवर, सड़कें, मैट्रो रेल का जमीन से उठा अलाइनमेण्ट, बहुमंजिला इमारतें, मॉल ... जो देखा बनते देखा। रिप वॉन विंकल बीस साल सोने के बाद उठा तो उसे दुनियां बदली नजर आई; पर बेंगळूरु के रिप वान विंकल को तो मात्र तीन चार साल में ही अटपटा लगेगा - कहां चले आये! कुछ ऐसा श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ ने व्यक्त किया - जो बैंगळूरु में ही रहते हैं बहुत अर्से से, पर स्टेशन क्षेत्र में हमसे मिलने बहुत अंतराल के बाद आये थे। उन्होने कहा कि देखते देखते सड़कें वन वे हो गयी हैं। जहां क्रॉसिंग हुआ करते थे, वहां फ्लाईओवर मिलते हैं। नये/काफी समय बाद आये व्यक्ति को अगर ड्राइव करना हो तो समझ नहीं आता कि कैसे किधर जाये!

महायज्ञ हो रहा है यहां, जिसमें हवि है सीमेण्ट, स्टील, बालू, पत्थर, ईंट ... और यज्ञफल है भवन, अट्टालिकायें, मॉल, सड़क, प्लॉईओवर, रेल, सड़क ...

हाईराइज टॉवर बनाती ऊंची क्रेने मुझे बैंगळूरु शहर की नव पताकायें सी लगती हैं। जहां देखो, वहां इन्हे पाते हैं हम। कितनी सशक्त निर्माण की मांसपेशियां बनाये जा रहा है यह महानगर, उत्तरोत्तर!

ऐसे में भी यहां की हरियाली जीवंत है। कॉक्रीट से मुकाबला करते सभी आकार प्रकार के वृक्ष अपने लिये जगह बनाये हुये हैं। बैंगळूरु में कैण्टोनमेण्ट हुआ करता था और है, उसके क्षेत्र में हरियाली बरकरार है। सड़कें चौड़ी करने के लिये वृक्ष कटे होंगे जरूर, पर फिर भी बाग बगीचों, सड़कों के किनारे या किसी भी लैण्डस्केप की बची जगह में वृक्ष सांस लेते दीखे। वाहनों ने प्रदूषण बढ़ाया होगा, पर वृक्षों की पत्तियों पर मुझे हरीतिमा अधिक दिखी। अन्यथा, इस महानगर के मुकाबले कहीं छोटे शहर-कस्बों में कहीं अधिक दुर्द्शा देखी है वृक्षों की। वहां पत्तों पर उनकी मोटाई से ज्यादा धूल कालिख जमा होती है, बिजली के तारों की रक्षा के लिये हर मानसून से पहले वृक्षों का जो बोंसाईकरण साल दर साल वहां होता है, वह वन्ध्याकरण जैसा ही होता है वृक्षों के लिये।

बैंगळूरु सिटी स्टेशन पर मैं प्रवास के दौरान रह रहा था। वहां रहने के कारण प्रवीण पाण्डेय ने मुझे सवेरे कब्बन पार्क और फ्रीडम पार्क की सैर का सुझाव दिया। उन्होने अपना वाहन भी वहां तक जाने के लिये सवेरे सवेरे भेज दिया। उस सुझाव के लिये उनका जितना धन्यवाद हम दम्पति दें, कम ही होगा। उन पार्कों में वृक्षों, वनस्पति और पक्षियों की विविधता देख कर मन आनन्दित हो गया! उनके कुछ चित्र भी मैने इस पोस्ट के लिये चुन लिये हैं।

कुल मिला कर निर्माण और हरीतिमा में मल्लयुद्ध हो रहा है बैंगळूरु में। मल्लयुद्ध ही कहा जायेगा। निर्माण के लिये वृक्षों का नादिरशाही कत्लेआम नहीं हो रहा। अन्यथा, पाया है कि छोटे शहरों, कस्बों में; घर सड़क, फैक्टरी बनाने वाले, जमीन हथियाने वाले; अपने वृक्षों, लैण्डस्केप, जीवों, जल और नदियों के प्रति कहीं अधिक निर्मम और कसाई होते हैं तथा वहां की नगरपालिकायें कहीं अधिक मूक-बधिर-पंगु, धूर्त और अन्धी होती हैं। वहां एक स्वस्थ मल्लयुद्ध की कोई सम्भावना ही नहीं होती।

जीतो, प्यारे वृक्षों, जीतो बैंगळूरु में! फिर कभी आऊंगा तुम्हें देखने!

[slideshow]